♠ બે કુહાડીઓ ♠

એક ગામમાં ગરીબ કઠિયારો રહેતો હતો. તે મજૂરી કરી પોતાનું ગુજરાન ચલાવતો હતો.

આ કઠિયારાએ એકવાર લોખંડનો ટુકડો ખરીદી એક લુહાર પાસે જઈ આ લોખંડના ટુકડામાંથી બે કુહાડી બનાવી આપવાનું કહ્યું.

લુહારે તે લોખંડના ટુકડામાંથી સરસ મજાની બે કુહાડીઓ બનાવી કઠિયારાને આપી.

કઠિયારાએ તે બે કુહાડીઓમાંથી એક ને ઘરના ખુણામાં મુકી દીધી. બીજી કુહાડી લઈ તે લાકડા કાપવા જંગલમાં ચાલ્યો ગયો.

થોડા દિવસ પછી કઠિયારાએ એક દિવસ પોતે જે કુહાડી વાપરતો હતો તે કુહાડીને તેણે ઘરના ખૂણામાં મૂકી.

ખૂણામાં પડેલી વણવપરાયેલી કુહાડીએ જોયું કે મારી સાથે જે કુહાડી બની હતી તે આટલી બધી કેમ ચમકે છે ? અને હું કેમ તેજ વગરની છું ?

તેણે તે કુહાડીને પૂછ્યું : ''અરે, આપણે બંને લોખંડના ટુકડામાંથી એક સાથે જ બની છતાં તું ચમકે છે. જ્યારે હું કાટી ગઈ ! આમ કેમ ?''

વપરાતી કુહાડીએ જવાબ આપ્યો : ''મને બનાવ્યા પછી હું સતત કામમાં આવું છું. કઠિયારો, મારો ઉપયોગ કરે છે. હું ઘસાઉં છું તેથી મારામાં ચમક છે. તું બની ત્યારથી એક ખૂણામાં પડી રહે છે. કંઈ ઉપયોગમાં આવતી નથી. તેથી તારા પર કાટ ચડી ગયો છે, અને જો તારો ઉપયોગ નહીં થાય તો હજુ પણ વધારે કાટ ચડી જશે !''

માણસ પણ મહેનત કરી, સારા કામ કરી, શરીરે ઘસાઈ, પરિશ્રમ કરીને ચમકે છે. તેથી ચમક ચારેબાજુ ફેલાય છે. જે આળસમાં પડયો રહે છે તેની કોઈ કિંમત થતી નથી. તેની ચમક અને તેજ પણ ચાલ્યાં જાય છે. માણસે સતત કામ કરતા રહેવું જોઈએ. મહેનત કરે તે સુખી થાય છે.

♠ सच्ची जीत ♠

एक गाँव में एक किसान रहता था। उसका नाम था शेरसिंह। शेरसिंह शेर-जैसा भयंकर और अभिमानी था। वह थोड़ी सी बात पर बिगड़कर लड़ाई कर लेता था। गाँव के लोगों स सीधे मुँह बात नहीं करता था। न तो वह किसी के घर जाता था और न रास्ते में मिलने पर किसी को प्रणाम करता था। गाँव के किसान भी उसे अहंकारी समझकर उससे नहीं बोलते थे।

उसी गाँव में एक दयाराम नाम का किसान आकर बस गया। वह बहुत सीधा और भला आदमी था। सबसे नम्रता से बोलता था। सबकी कुछ-न-कुछ सहायता किया करता था। सभी किसान उसका आदर करते थे और अपने कामों में उससे सलाह लिया करते थे।

गाँव के किसानों ने दयाराम से कहा-'भाई दयाराम! तुम कभी शेरसिंह के घर मत जाना। उससे दूर ही रहना। वह बहुत झगड़ालू है।'

दयाराम हँसकर कहा-'शेरसिंह ने मुझसे झगड़ा किया तो मैं उसे मार ही डालूँगा।'

दूसरे किसान भी हँस पड़े। वे जानते थे कि दयाराम दयालु है। वह किसी को मारना तो दूर, किसी को गाली तक नहीं दे सकता। लेकिन यह बात किसी ने शेरसिंह से कह दी। शेरसिंह क्रोध से लाल हो गया। वह उसी दिन से दयाराम से झगड़ने की चेष्टा करने लगा। उसने दयाराम के खेत में अपने बैल छोड़ दिये। बैल बहुत-सा खेत चर गये; किंतु दयाराम ने उन्हें चुपचाप खेत से हाँक दिया।
शेरसिंह ने दयाराम के खेत में जाने वाली पानी की नाली तोड़ दी। पानी बहने लगा। दयाराम ने आकर चुपचाप नाली बाँध दी। इसी प्रकार शेरसिंह बराबर दयाराम की हानि करता रहा; किंतु दयाराम ने के बार भी उसे झगड़ने का अवसर नहीं दिया।

एक दिन दयाराम के यहाँ उनके सम्बन्धी ने लखनऊ के मीठे खरबूजे भेजे। दयाराम सभी किसानों के घर एक-एक खरबूजा भेज दिया; लेकिन शेरसिंह ने उसका खरबूजा यह कहकर लौटा दिया कि 'मैं भिखमंगा नहीं हूँ। मैं दूसरों का दान नहीं लेता।'

बरसात आयी। शेरसिंह एक गाड़ी अनाज भरकर दूसरे गाँव आ रहा था। रास्ते में एक नाले के कीचड़ में उसकी गाड़ी फँस गयी। शेरसिंह के बैल दुबले थे। वे गाड़ी को कीचड़ में से निकल नहीं सके। जब गाँव में इस बात की खबर पहुँची तो सब बोले-'शेरसिंह बड़ा दुष्ट है। उसे रात भर नाले में पड़े रहने दो।'

लेकिन दयाराम ने अपने बलवान बैल पकड़े और नाले की ओर चल पड़ा। लोगों ने उसे रोका और कहा-'दयाराम! शेरसिंह तुम्हारी बहुत हानि की है। तुम तो कहते थे कि `मुझसे लड़ेगा तो उसे मार ही डालूँगा। फिर तुम आज उसकी सहायता करने क्यों जाते हो?'

दयाराम बोला-'मैं आज सचमुच उसे मार डालूँगा। तुम लोग सबेरे उसे देखना।'

जब शेरसिंह ने दयाराम को बैल लेकर आते देखा तो गर्व से बोला-'तुम अपने बैल लेकर लौट जाओ। मुझे किसी की सहायता नहीं चाहिये।'

दयाराम ने कहा-'तुम्हारे मन में आवे तो गाली दो, मन में आवे मुझे मारो, इस समय तुम संकट में हो। तुम्हारी गाड़ी फँसी है और रात होने वाली है। मैं तुम्हारी बात इस समय नहीं मान सकता।'

दयाराम ने शेरसिंह के बैलों को खोलकर अपने बैल गाड़ी में जोत दिये। उसके बलवान बैलों ने गाड़ी को खींचकर नाले से बाहर कर दिया। शेरसिंह गाड़ी लेकर घर आ गया। उसका दुष्ट स्वभाव उसी दिन से बदल गया। वह कहता था-'दयाराम ने अपने उपकार के द्वारा मुझे मार ही दिया। अब मैं वह अहंकारी शेरसिंह कहाँ रहा।' अब वह सबसे नम्रता और प्रेम का व्यवहार करने लगा। बुराई भलाई से जीतना ही सच्ची जीत है। दयाराम ने सच्ची जीत पायी।

♠ समस्या का समाधान खोंजे l ♠

एक किसान था. वह एक बड़े से खेत में खेती किया करता था. उस खेत के बीचो-बीच पत्थर का एक हिस्सा ज़मीन से ऊपर निकला हुआ था जिससे ठोकर खाकर वह कई बार गिर चुका था और ना जाने कितनी ही बार उससे टकराकर खेती के औजार भी टूट चुके थे l

रोजाना की तरह आज भी वह सुबह-सुबह खेती करने पहुंचा पर जो सालों से होता आ रहा था आज भी वही हुआ, एक बार फिर किसान का हल पत्थर से टकराकर टूट गया. किसान बिल्कुल क्रोधित हो उठा , और उसने मन ही मन सोचा की आज जो भी हो जाए वह इस चट्टान को ज़मीन से निकाल कर इस खेत के बाहर फ़ेंक देगा l

वह तुरंत भागा और गाँव से लोगों को बुला लाया और सभी को लेकर वह उस पत्थर के पास पहुंचा l

मित्रों, किसान बोला, ये देखो ज़मीन से निकले चट्टान के इस हिस्से ने मेरा बहुत नुकसान किया है, और आज हम सभी को मिलकर इसे जड़ से निकालना है और खेत के बाहर फेक देना है l

और ऐसा कहते ही वह फावड़े से पत्थर के किनारे पर वार करने लगा, पर ये क्या ! अभी उसने एक-दो बार ही मारा था की पूरा-का पूरा पत्थर ज़मीन से बाहर निकल आया. साथ खड़े लोग भी अचरज में पड़ गए और उन्ही में से एक ने हँसते हुए पूछा, क्यों भाई, तुम तो कहते थे कि तुम्हारे खेत के बीच में एक बड़ी सी चट्टान दबी हुई है, पर ये तो एक मामूली सा पत्थर निकला ?

किसान भी आश्चर्य में पड़ गया सालों से जिसे वह एक भारी-भरकम चट्टान समझ रहा था दरअसल वह बस एक छोटा सा पत्थर था!! उसे पछतावा हुआ कि काश उसने पहले ही इसे निकालने का प्रयास किया होता तो उसे इतना नुकसान नहीं उठाना पड़ता।

🌼 शिक्षा 🌼

इस किसान की तरह ही हम भी कई बार ज़िन्दगी में आने वाली छोटी-छोटी बाधाओं को बहुत बड़ा समझ लेते हैं और उनसे निपटने की बजाये तकलीफ उठाते रहते हैं. ज़रुरत इस बात की है कि हम बिना समय गंवाएं उन मुसीबतों से लड़े, और जब हम ऐसा करेंगे तो कुछ ही समय में चट्टान सी दिखने वाली समस्या एक छोटे से पत्थर के समान दिखने लगेगी जिसे हम आसानी से ठोकर मार कर आगे बढ़ सकते हैं।

♠ अमृत फल ♠

एक समय में विक्रम सेन नामक राजा राज करता था। वह था तो बड़ा दयालु, लेकिन प्रत्येक कार्य को बिना विचारे ही करने का उसका स्वभाव बन गया था। उसके पास एक चिड़िया थी, जो उसे अत्यंत प्रिय थी। वह एक क्षण भी उससे अलग रहना पसंद नहीं करता था।

चिड़िया भी सम्राट को बहुत चाहती थी। एक बार चिड़िया ने राजा से अपने संबंधियों से मिलने की इच्छा प्रकट की। राजा ने शीघ्र लौटने का र्निदेश देकर उसे अनुमति दे दी। चिड़िया उड़ गई और अपने संबंधियों से मिलकर बड़ी प्रसन्न हुई। लौटते समय चिड़िया के पिता ने उसे सम्राट के लिए एक अमृत फल दिया।

चिड़िया खुशी खुशी फल को लेकर उड़ चली, रास्ते में रात हो गई। अतः उसने विचार किया कि क्यों न पेड़ पर राज गुजार कर सुबह को महल पहुंचे। वह पास ही एक पेड़ पर बैठ गई। पेड़ की जड़ में एक सांप रहता था।

उस रात वह भूखा था। भोजन की तलाश में पेड़ के ऊपरी हिस्से में रेंगने लगा। उसने चिड़िया के पास रखे हुए अमृत फल को चख लिया। जिसके कारण वह फल विषैला हो गया। सुबह फल ले चिड़िया महल में पहुंची और राजा को भेंट कर दिया। राजा बहुत प्रसन्न हुआ।

उसने फल को खाने का विचार किया ही था कि, मंत्री ने राजा से कहा, ”महाराज! इसे खाने से पहले इसका परीक्षण करवा लीजिए।“ अतः एक पशु पर उसका परीक्षण कराया गया। पशु फल का टुकड़ा खाते ही मर गया। इस प्रकार वह अमृत फल ‘विष फल’ सिद्ध हो गया। सम्राट ने क्रोधित होकर चिड़िया से कहा, ”धोखेबाज चिड़िया, मुझे मारना चाहती थी… ले अब तू भी मर।“ और यह कहकर सम्राट ने चिड़िया को मौत के घाट उतार दिया और महल के बीचों बीच उसे तथा उस फल को भी गड़वा दिया। धीरे धीरे सम्राट इस घटना को भूल गया।

कुछ समय बाद उसी स्थान पर एक पेड़ निकल आया और धीर धीरे बड़ा हो गया। अब उस पर अमृत फल जैसे फल लगने लगे। इस पर मंत्री ने सम्राट को सुझाव दिया, ”महाराज! ये फल भी विषैले होंगे। अतः किसी को इनके समीप आने की मनाही करवा दीजिए।“ सम्राट ने आदेश जारी करवा दिया और पेड़ के चारों ओर ऊंची ऊंची दीवारें उठवा दीं, ताकि कोई पेड़ तक न पहुंच सके।

उसी राज्य में एक बूढ़ा और बुढ़िया रहते थे। वे कोढ़ जैसे भयंकर रोग से ग्रस्त थे और भूखों मर रहे थे। बुढ़िया ने बूढ़े से कहा, ”महल के बगीचे से वह ‘विष फल’ क्यों नहीं तोड़ लाते, ताकि उसे खाकर हमें दुनिया के कष्टों से छुटकारा मिल जाए।“

अतः बूढ़े ने बड़े प्रयत्न से वह फल प्राप्त कर लिया और दोनों ने आधा आधा खा लिया। परंतु यह क्या? उसे खाते ही वे दोनों स्वस्थ और सुंदर हो गए। यह देखकर दोनों बड़े आश्चर्यचकित हुए और सारा वृत्तांत सम्राट को कह सुनाया। सम्राट को यह समझते देर नहीं लगी कि वह फल वास्तव में अमृत फल था। अब हो भी क्या सकता था।

सम्राट अपने कुकृत्य पर बड़ा दुखी हुआ और उसने भविष्य में बिना सोचे विचारे कोई कार्य न करने का दृढ़ निश्चय किया। उसने महल के पास एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया और इस प्रकार चिड़िया की याद को सदा के लिए अमर कर दिया।

♠ दूसरों के सुख में ही हमारा सुख I ♠

दो मित्र थे एक सुनार दूसरा माली। एक दिन माली ने सुनार से कहा। क्यो अपनी दुकान पर बैठकर ठुक-ठुक करते रहते हो? एक दिन बगीचे में आओ। विभिन्न प्रकार के सुंदर और सुगंधित फूलों से साक्षात्कार करोगे तो तुम्हारा मन भी खिल उठेगा।

उसकी बात सुनकर सुनार बोला- दोस्त मै अवश्य आऊंगा। मगर शर्त यह है कि तुम्हें भी मेरी दुकान पर आकर मेरे द्वारा निर्मित आभूषणों को देखना होगा। मेरे विचार से अपने मित्र की कलाकारी देखकर तुम्हें भी खुशी मिलेगी। दोनों ने परस्पर न्यौता स्वीकार कर लिया। एक दिन सुनार माली, माली के बगीचे में पहुंचा। सोने का पारखी सुनार एक एक फूल को देखता और मुंह बिचकाकर दूसरे पौधे की तरफ रूख कर लेता। इस तरह सुनार को बगीचे में तनिक भी आनंद नहीं आया। अगले दिन माली सुनार की दुकान पर गया। सुनार ने उसके समझ अपने द्वारा बनाए हुए विभिन्न शैलियों के सुंदर आभूषण रखे। माली प्रत्येक आभूषण को उठा- उठाकर सूंघता और निराश होकर रख देता।

उसे भी उतनी ही निराशा हाथ लगी, जितनी कि सुनार को लगी थी।

वस्तुत: हम सभी सुनार और माली ही तो हैं। जीवन में सुख- संतोष खोजने की हमारी अपनी अपनी कसौटियां है। कठिनाई यह है कि हम फूलों को सोने की कसौटी पर कसते है और सोने में सुगंध खोजते है। परिणाम में निराशा हाथ आती है। बेहतर होगा कि सुख- संतोष के सीमित दायरे तोड़कर इनका विस्तार किया जाए। दूसरों के सुख में सुखी होकर देखिए, कैसे आत्मिक सुख आपके पास दौड़ा चला आएगा।

♠ धैर्य का फल ♠

बार-बार पैरों तले कुचले जाने के कारण मिट्टी अपने भाग्य पर रो पडी l अहो! मैं कैसी बदनसीब हूँ कि सभी लोग मेरा अपमान करते हैं। कोई भी मुझे सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता जबकि मेरे ही भीतर से प्रस्फुटित होने वाले फूल का कितना सम्मान है। फूलों की माला पिरोकर गले में पहनी जाती है। भक्त लोग अपने उपास्य के चरणों में चढाते हैं। वनिताएं अपने बालों में गूंथ कर गर्व का अनुभव करती हैं। अच्छा हो कि मैं भी लोगों के मस्तिष्क पर चढ जाऊं!

मिट्टी के अंदर से निकलती हुई आह को जानकर कुंभकार बोला-मिट्टी! तुम यदि सम्मान पाना चाहती हो तो तुम्हें बडा सम्मान दिला सकता हूँ लेकिन एक शर्त है।

'एक क्या तुम्हारी जितनी भी शर्ते हों, मुझे सभी स्वीकार हैं। बस मुझे लोगों के पैरों तले से हटा दो,' कुंभकार की बात को बीच में ही काटते हुए मिट्टी ने कहा।

'तो फिर ठीक है, तैयार हो जाओ'- कहते हुए कुंभकार ने जमीन खोदकर मिट्टी बाहर निकाली। उसे घर ले आया। पानी में डालकर उसे बहुत समय तक गीली रखा। इतना ही नहीं फिर पैरों से उसे खूब रौंदा। कष्टों को सहते हुए मिट्टी बोली, 'अरे भाई! मै सम्मान का पात्र कब बनूंगी?'

'मिट्टी बहिन! धैर्य रखो। अभी सहती जाओ, तुम्हें इसका मधुर फल जरूर मिलेगा।'

कुंभकार की बात सुनकर मिट्टी कुछ नहीं बोली।
कुंभकार ने मिट्टी को चाक पर चढाया और उसे तेजी से घुमाते हुए घडे का रूप दिया। फिर धूप में सुखाया। कष्ट सहते-सहते जब मिट्टी का धैर्य टूटने लगा तो कुंभकार बोला, 'बस बहन! अब केवल एक अग्नि-परीक्षा ही शेष है। और सभी में तुम उत्तीर्ण हो चुकी हो। यदि उसमें भी उत्तीर्ण रही तो लोग सती सीता की तरह तुम्हें भी मस्तक पर चढा लेंगे। सीता को लोग सिर झुकाकर सम्मान देते हैं किन्तु तुम्हें तो वनिताएं सिर पर सजा कर घूमेंगी। '

आखिर मिट्टी ने सब कुछ सह कर अग्नि-परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली। फिर क्या था! सचमुच सुंदरियां उसे सिर पर उठाए फिरने लगी। मिट्टी अपने सम्मान पर प्रफुल्लित हो उठी। आखिर सम्मान पाने के लिए कष्ट तो सहने ही पड़ते हैं।

♠ गति ही जीवन है l ♠

वियतनाम के राष्ट्रनायक हो ची मिन्ह ने अपने एक संस्मरण में लिखा है- मैं जब नौ वर्ष का था तो स्कूल की परीक्षा में अनुतीर्ण हो गया। खराब परीक्षाफल देख मैं बहुत दु:खी हुआ। जीवन निस्सार और दुनिया रसहीन लगने लगी। इस मानसिक अशांति और निराशा के चलते मैं आत्महत्या करने का विचार करने लगा। मेरे परिवार के सभी लोग मुझसे बहुत स्नेह करते थे और मेरी निराशा से वे भी काफी दुखी थे। मेरे पिता जी ने मुझे खूब समझाया,मां ने खूब स्नेह दिखाया, कुल पुरोहित ने कई बार मंत्रसिद्ध फल खिलाए, लेकिन सब कुछ व्यर्थ रहा। रात को नींद नही आती और दिन बेचैनी में कटता।

ऐसे में एक दिन मैं चुपचाप घर से भाग निकला। एक बौद्ध मठ के पास से गुजर रहा था तो एक भिक्षु द्वारा गाई जा रही कविता के मधुर स्वरों को सुनकर पैर ठिठके। भिक्षु गा रहा था पानी मैला क्यों नहीं होता? क्यों कि वह बहता रहता है पानी के मार्ग में बाधाएं क्यों नहीं आती क्यों कि वह बहता रहता है। पानी का एक बिंदु झरने से नदी, नदी से महानदी और महानदी से समुद्र क्यों बन जाता है? क्यों कि वह बहता है। इसलिए मेरे जीवन तुम रुको मत, बहते रहो, बहते रहो। काफी देर तक मैं आवाक खड़ा रहा। जब लौटा तो बहता जल था। आज भी बहता जल हूं। मैं सब जगह जाता हूं और अपनी गति, जो कुछ मुझमें शेष है, सबको देता हूं, क्यों कि मैं बहता जल हूं। गतिमान हूं।

सार यह है कि जीवन में कोई उपलब्धि न पाने की असफलता से निराश होकर कभी नकारात्मक सोच को हावी न होने दें, बल्कि उससे सबक लेकर दूसरे बेहतर लक्ष्य की ओर बढ़ें, क्यों कि गति ही जीवन है और रूकना मृत्यु।

♠ गुणों के देवता ♠



एक दिन कन्फ्यूशियस के पास सम्राट ने आकर कहा, 'राज्य में बेईमानी बढ़ती जा रही है, जहां देखो वहां छल-कपट और धोखेबाजी के दर्शन किए जा सकते हैं। क्या राज्य में ऐसा कोई आदमी होगा, जो सदाचारी और गुणों के देवता की कृपा रखता हो।'

कन्फ्यूशियस ने जबाव दिया, 'ऐसा व्यक्ति है। एक तो स्वयं आप क्योंकि सत्य को जानने की जिज्ञासा रखने वाले व्यक्ति को में महान मानता हूं। लेकिन कन्फ्यूशियस की बातों में न आते हुए सम्राट ने कहा कि मैं महान हो सकता हूं। लेकिन मैं एक अन्य व्यक्ति को देखना चाहूंगा।'

कन्फ्यूशियस बोले, 'तब तो वह व्यक्ति मैं हूं।' सम्राट ने कहा, 'मैं आपसे भी महान आदमी को देखना चाहता हूं। कृप्या मुझे उसके पास ले चलिए।' कन्फ्यूशियस ने एक क्षण के लिए सम्राट की ओर देखकर कहा, 'सम्राट हमें उठकर कहीं जाने की जरूरत नहीं। हमें अपने आसपास कई ऐसे व्यक्ति देखने को मिलेंगे। हमें केवल उनकी ओर उस दृष्टि से देखना होगा।'

कन्फ्यूशियस ने सामने की इशारा करते हुए कहा, 'देखिए सम्राट उस सौ साल की महिला को जो कुदाल से कुंआ खोद रही है।' सम्राट ने कहा, 'लेकिन उसे कुंआ खोदने की क्या जरूरत।'

कन्फ्यूशियस बोले, आपने ठीक कहा मगर जरूरत ही सब कुछ नहीं हुआ करती। जो दूसरों के लिए इस तरह निर्लिप्त होकर अपना जीवन बलिदान करते हैं, वही वास्तव में महान हैं। वह इस धरती पर ईश्वर हैं।

♠ सुनहरा नेवला ♠



महाभारत में एक कथा मिलती है। एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू के साथ रहता था। कथा कहने से जो थोड़ा बहुत मिलता था, उसी में सब मिल जुल कर खाते थे। एक बार वहां अकाल पड़ गया। कई दिन तक परिवार में किसी को अन्न नहीं मिला।

कुछ दिनों बाद उसके घर में कुछ आटा आया। ब्राह्मणी ने उसकी रोटी बनाई और खाने के लिए उसे चार भागों में बांटा। किंतु जैसे ही वे भोजन करने बैठे, दरवाजे पर एक अतिथि आ गया। ब्राह्मण ने अपने हिस्से की रोटी अतिथि के सामने रख दी, मगर उसे खाने के बाद भी अतिथि की भूख नहीं मिटी। तब ब्राह्मणी ने अपने हिस्से की रोटी उसे दे दी। इससे भी उसका पेट नहीं भरा तो बेटे और पुत्रवधू ने भी अपने-अपने हिस्से की रोटी दे दी। अतिथि सारी रोटी खाकर आशीष देता हुआ चला गया। उस रात भी वे चारों भूखे रह गए। उस अन्न के कुछ कण जमीन पर गिरे पड़े थे। नेवला उन कणों पर लोटने लगा तो जहां तक नेवले के शरीर से उन कणों का स्पर्श हुआ, उसका शरीर सुनहरा हो गया। यह अहसास होते ही कि ऐसा त्याग की महिमा के कारण हुआ है, नेवला सारी दुनिया में घूमता फिरा ताकि ऐसा ही त्याग खोज सके जिससे उसका बाकी शरीर भी सोने का हो जाए। उसने युधिष्ठिर के एक भव्य यज्ञ के बारे में सुना, जहां हजारों लोगों को भोजन दिया जा रहा था।

यज्ञ के अंत में सोने के आधे शरीर वाला वह नेवला यज्ञ-भूमि में आया और हवन कुंड की राख में लोटने लगा। लेकिन कुछ भी नहीं हुआ।

नेवले ने नतीजा निकाला कि हृदय से किए गए उस गरीब आदमी के त्याग में राजाओं के भव्य यज्ञों से अधिक शक्ति थी।

♠ सच बोलने की हिम्मत ♠

स्वामी विवेकानंद एक दिन कक्षा में मित्रों को कहानी सुना रहे थे। सभी इतने मग्न थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब मास्टरजी कक्षा में आये और पढ़ाना शुरू कर दिया।

मास्टरजी को कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी। “कौन बात कर रहा है?” उन्होंने पूछा। सभी ने स्वामी जी और उनके साथ बैठे छात्रों की तरफ इशारा कर दिया। मास्टरजी ने तुरंत उन छात्रों को बुलाया और पाठ से संबंधित एक प्रश्न पूछने लगे।

जब कोई उत्तर न दे सका, तो मास्टरजी ने स्वामी जी से भी वही प्रश्न किया।

उन्होंने उत्तर दे दिया। मास्टरजी को यकीन हो गया कि स्वामी जी पाठ पर ध्यान दे रहे थे और बाकी छात्र बातचीत में लगे थे। उन्होंने स्वामी जी को छोड़ सभी को बेंच पर खड़े होने की सजा दे दी। सभी छात्र बेंच पर खड़े होने लगे, स्वामी जी ने भी यही किया। तब मास्टर जी स्वामी जी से बोले, “तुम बैठ जाओ।” स्वामी जी ने कहा, “नहीं सर, मुझे भी खड़ा होना होगा क्योंकि मैं ही इन छात्रों से बात कर रहा था।” सभी उनकी सच बोलने की हिम्मत देख बहुत प्रभावित हुए।

♠ कर्म बड़ा या भाग्य ♠



भाग्य और कर्म को समझने के लिए पुराणों में एक कहानी का उल्लेख मिलता है। एक बार देवर्षि नारद जी वैकुंठधाम गए, वहां उन्होंने भगवान विष्णु का नमन किया। नारद जी ने श्रीहरि से कहा, 'प्रभु! पृथ्वी पर अब आपका प्रभाव कम हो रहा है। धर्म पर चलने वालों को कोई अच्छा फल नहीं मिल रहा, जो पाप कर रहे हैं उनका भला हो रहा है।'

तब श्रीहरि ने कहा, 'ऐसा नहीं है देवर्षि, जो भी हो रहा है सब नियति के जरिए हो रहा है।'

नारद बोले, मैं तो देखकर आ रहा हूं, पापियों को अच्छा फल मिल रहा है और भला करने वाले, धर्म के रास्ते पर चलने वाले लोगों को बुरा फल मिल रहा है।

भगवान ने कहा, कोई ऐसी घटना बताओ। नारद ने कहा अभी मैं एक जंगल से आ रहा हूं, वहां एक गाय दलदल में फंसी हुई थी। कोई उसे बचाने वाला नहीं था। तभी एक चोर उधर से गुजरा, गाय को फंसा हुआ देखकर भी नहीं रुका, वह उस पर पैर रखकर दलदल लांघकर निकल गया। आगे जाकर चोर को सोने की मोहरों से भरी एक थैली मिली।

थोड़ी देर बाद वहां से एक वृद्ध साधु गुजरा। उसने उस गाय को बचाने की पूरी कोशिश की। पूरे शरीर का जोर लगाकर उस गाय को बचा लिया लेकिन मैंने देखा कि गाय को दलदल से निकालने के बाद वह साधु आगे गया तो एक गड्ढे में गिर गया। प्रभु! बताइए यह कौन सा न्याय है?

नारद जी की बात सुन लेने के बाद प्रभु बोले, 'यह सही ही हुआ। जो चोर गाय पर पैर रखकर भाग गया था, उसकी किस्मत में तो एक खजाना था लेकिन उसके इस पाप के कारण उसे केवल कुछ मोहरें ही मिलीं।'

वहीं, उस साधु को गड्ढे में इसलिए गिरना पड़ा क्योंकि उसके भाग्य में मृत्यु लिखी थी लेकिन गाय के बचाने के कारण उसके पुण्य बढ़ गए और उसे मृत्यु एक छोटी सी चोट में बदल गई। इंसान के कर्म से उसका भाग्य तय होता है। इंसान को कर्म करते रहना चाहिए, क्योंकि कर्म से भाग्य बदला जा सकता है।

♠ श्रेष्ठ कौन? ♠



एक बार शरीर के अंगों में इस बात को लेकर झगड़ा छिड़ गया कि हम में से बड़ा कौन है। वाणी कहने लगी मैं बड़ी हूं, क्योंकि मैं जिसके पास नहीं होती वह बोल नहीं पाता है। कान कहने लगे- यदि हम न रहें तो व्यक्ति को कुछ भी सुनाई न दे, इसलिए हम बड़े हैं। मन कहने लगा- मेरे न रहने से व्यक्ति को किसी चीज़ का पता नहीं चलता इसलिए मैं सबसे श्रेष्ठ हूं।

प्राण ने अपनी तारीफ करते हुए कहा कि यदि मैं शरीर का साथ छोड़ दूं तो यह शरीर ही मृत हो जाए, इसलिए मै सबसे बड़ा हूं। यह विवाद काफी समय तक चलता रहा, लेकिन कोई हल नहीं निकला। फिर इंद्रियों ने कहा- इस विवाद का निबटारा करने के लिए हमें प्रजापति के पास चलना चाहिए। वहीं इस बात का निर्णय करेंगे कि हममे से श्रेष्ठ कौन है? ऐसा सोचकर इंद्रियां ब्रह्मा के पास पहुंची।

ब्रह्मा बोले तुम में से जिसके शरीर से चले जाने पर शरीर बेजान यानी निष्क्रिय हो जाए तो समझ लेना वह श्रेष्ठ है। इंद्रियों ने ऐसा ही किया। सबसे पहले वाणी शरीर से अलग हो गई। साल भर के बाद फिर लौटी। उसने देखा और सोचा मेरे जाने से शरीर पर कुछ प्रभाव नहीं पड़ा। ऐसा ही आंखों ने भी किया, लेकिन शरीर पर कोई अंतर नहीं पड़ा। अब कानों की बारी थी। उन्होंने ने भी शरीर छोड़ दिया। फिर भी शरीर पहले जैसा ही रहा।
उसके बाद मन ने शरीर छोड़ दिया। मन के न रहने पर शरीर सिर्फ मानसिक विकास नहीं कर पाता, लेकिन अन्य काम तो चलता ही रहता है। सबसे आखिर में जब प्राण ने शरीर छोड़ना चाहा तो सारी इंद्रियां व्याकुल हो उठी। उन्होंने अनुभव किया कि प्राण निकल जाने पर हम भी बेकार हो जाएंगी। इसलिए उन्होंने प्राण की श्रेष्ठता स्वीकार कर ली। यह प्राण शक्ति ईश्वर से मिलती है। शास्त्रों ने परमात्मा को ही प्राण कहकर पुकारा है।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि ईश्वर, परमात्मा या भगवान हम उन्हें जिस भी नाम से पुकारें वो हमारे ही अंदर हैं, क्योंकि जहां वो नहीं होते वहां जीवन संभव ही नहीं है।

♠ व्यक्तित्व ही हमारा आईना है। ♠



बात द्वापरयुग की है। अज्ञातवास में पांडव रूप बदलकर ब्रह्मणों के वेश में रह रहे थे। एक दिन उन्हें कुछ ब्राह्मण मिले। वे राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी के स्वयंवर में जा रहे थे। पांडव भी उनके साथ चल दिए।
स्वयंवर में पानी में देखकर ऊपर घूम रही मछली पर निशाना लगाना था। वहां मौजूद सभी ने प्रयास किया। लेकिन निशाना सिर्फ अर्जुन ही लगा पाए। शर्त के अनुसार द्रौपदी का स्वयंवर और इसके बाद शादी अर्जुन के साथ हुई। इसके बाद पांडव द्रौपदी को लेकर अपनी कुटिया में ले आए।

एक ब्राह्मण द्वारा स्वंयवर में विजयी होने पर राजा द्रुपद को बड़ी हैरानी हुई। वह अपनी पुत्री का विवाह अर्जुन जैसे वीर युवक के साथ करना चाहते थे। अतः राजा द्रुपद ब्रह्मणों की वास्तविकता का पता लगाने के लिए राजमहल में भोज का कार्यक्रम रखा और उन ब्रह्मणों को भी बुलाया। राजमहल को कई वस्तुओं से सजाया गया।

एक कक्ष में फल फूल तो दूसरे कक्ष में अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित किया गया। भोजन करने के बाद सभी अपनी मनपसंद चीजें देखने लगे। लेकिन ब्राह्मण वेशधारी अस्त्र-शस्त्र वाले कमरे में पहुंचे। यह सब कुछ राजा द्रुपद देख रहे थे। वे समझ गए यह ब्राह्मण नहीं, बल्कि क्षत्रिय हैं।

मौका मिलते ही उन्होंने ब्राह्मण वेशधारी युधिष्ठिर से पूछा, सच बताइए आप ब्रह्मण हैं या क्षत्रिय। युधिष्ठिर हमेशा सच बोलते थे। उन्होंने स्वीकार कर लिया कि वे सचमुच क्षत्रिय हैं। और स्वयंवर जीतने वाले अर्जुन है। यह जानकर राजा द्रुपद बहुत प्रसन्न हुए। इस प्रसंग से हमे यही शिक्षा मिलती है कि व्यक्ति अपने वेश भले ही बदल लें लेकिन उसके विचार आसानी से नहीं बदलते हैं। हम जीवन में जैसे काम करते हैं, वैसे ही हमारे विचार होते हैं।

♠ दुनिया बदलते देर नहीं लगती ♠

एक राजा था जिसे राज्य करते काफी समय हो गया था, बाल भी सफेद होने लगे थे। एक दिन उसने अपने दरबार में उत्सव रखा और अपने गुरु तथा मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमंत्रित किया। उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलावा भेजा।

राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्राएं अपने गुरु को दी ताकि नर्तकी के अच्छे गीत नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सके। सारी रात नृत्य चलता रहा। सुबह होने वाली थीं, नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊंघ रहा है, उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा...

'बहु बीती, थोड़ी रही, पल-पल गई बिहाई।
एक पलक के कारने, ना कलंक लग जाए।'

अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अलग-अलग अपने-अपने अनुरूप अर्थ निकाला। तबले वाला सतर्क होकर तबला बजाने लगा। जब ये बात गुरु ने सुनी, तो उन्होंने सारी मोहरे उस मुजरा करने वाली को दे दी। वही दोहा उसने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार उसे दे दिया। उसने फिर वही दोहा दोहराया तो राजा के लड़के ने अपना मुकुट उतार कर दे दिया।

वहीं दोहा वह बार-बार दोहराने लगी, राजा ने कहा- बस कर! तुमने वेश्या होकर एक दोहे से सबको लूट लिया है।
जब यह बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों में पानी आ गया और कहने लगा, 'राजा इसको तू वेश्या न कह, ये अब मेरी गुरु है। इसने मेरी आंखें खोल दी है कि मैं सारी उम्र जंगलों में भक्ति करता रहा और आखिरी समय में मुजरा देखकर अपनी साधना नष्ट करने आ गया हूं, भाई मैं तो चला! राजा की लड़की ने कहा, 'आप मेरी शादी नहीं कर रहे थे, आज मैंने आपके महावत के साथ भाग कर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था। इसने मुझे सुमति दी है कि कभी तो तेरी शादी होगी। क्यों अपने पिता को कलंकित करती है?'

राजा के लड़के ने कहा, 'आप मुझे राज नहीं दे रहे थे। मैंने आपके सिपाहियों के साथ मिलकर आपका कत्ल करवा देना था। इसने समझाया है कि आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर लेते हो?

जब यह सारी बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्मज्ञान हुआ क्यों न मैं अभी राजकुमार का राज तिलक कर दूं, गुरु भी मौजूद है। उसी समय राजा ने अपने बेटे का राजतिलक कर दिया और लड़की से कहा- 'बेटी, मैं जल्दी ही योग्य वर देख कर तुम्हारा भी विवाह कर दूंगा।'

यह सब देख कर मुजरा करने वाली नर्तकी ने कहा कि, मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, मैं तो न सुधरी। आज से मैं अपना धंधा बंद करती हूं। हे प्रभु! आज से मैं भी तेरा नाम सुमिरन करूंगी।

इस कथा से हमे यह शिक्षा मिलती है कि समझ आने की बात है, दुनिया बदलते देर नहीं लगती। एक दोहे की दो लाइनों से भी ह्रदय परिवर्तन हो सकता है।

♠ विद्या की रेखा ♠


बहुत पुरानी बात है। एक बार एक बालक को उसके पिताजी ने गुरुकुल में अध्ययन के लिए भेजा। उस बालक ने गुरुकुल में विद्या अध्ययन करने लगा। तभी एक दिन गुरुजी ने उस बच्चे को एक सबक याद करने के लिए दिया।

लेकिन वह बहुत कोशिश करने के बाद भी सबक याद न कर सका। तब गुरुजी को गुस्सा आ गया। और उन्होंने दंड देने के लिए डंडा उठाया। तब उस लड़के ने अपना हाथ आगे कर दिया।

गुरुजी ज्योतिष के जानकर थे। उन्होंने बच्चे का हाथ देखा तो उनका गुस्सा ठंडा हो गया और वह चले गए।
लेकिन एक दिन उस बालक ने गुरुजी से पूछा, 'गुरुजी आपने उस दिन दंड देने वाले थे, लेकिन मेरा हाथ देखने के बाद दंड नहीं दिया।' तब गुरुजी बोले, 'बेटा तुम्हारी हाथ में विद्या की रेखा नहीं है। विद्या की रेखा न होने के कारण तुम सबक कभी भी याद नहीं कर सकते थे। हो सकता है तुम आगे भी विद्या ग्रहण न कर पाओ।'

यह सुनकर वह बालक बोला, 'विद्या की रेखा नहीं हुई तो क्या हुआ। मैं अभी इसे बना देता हूं। और उस लड़के ने एक नुकीले पत्थर से हाथ पर विद्या की रेखा बना दी।' यही बालक आगे चलकर संस्कृत के महान विद्वान पाणिनि के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

विद्या अध्ययन करने के लिए रेखाओं की जरूरत नहीं बल्कि सच्ची लगन, मेहनत, स्वयं पर विश्वास और कठिन परिश्रम की जरूरत होती है।

♠ સૌથી સુંદર ફૂલ ♠

કિશનગઢના રાજાના મુખ્ય સલાહકારનું અણધાર્યું અવસાન થયું. રાજાનામુખ્ય સલાહકાર સદૈવ પ્રજાહિતને જોનારા અને રાજાને સાચી સલાહ આપનારા હતા. પરિણામે પ્રજા ખૂબ સુખી હતી અને લોકો રાજ પ્રતિ વફાદાર હતા.

હવે રાજા સમક્ષ વિકટ પ્રશ્ન ઊભો થયો. રાજનું હિત ઇચ્છનારો અને પ્રજાનું કલ્યાણ ચાહનારો સલાહકાર મેળવવો ક્યાંથી ? આને માટે રાજાએ દિવસોના દિવસો સુધી વિચાર કર્યો અને છેવટે નક્કી કર્યું કે પોતાના દરબારમાંથી જ કોઈ યોગ્ય વ્યક્તિને શોધીને મુખ્ય સલાહકારના પદે નિયુક્ત કરવો.

એક દિવસ રાજાએ ભરદરબારમાં સહુને પ્રશ્ન કર્યો,  'જગતમાં સૌથી વધુ સુંદર ફૂલ કયું કહેવાય ?'

રાજાના મુખ્યમંત્રીએ તત્કાળ કહ્યું, 'મહારાજ, ગુલાબનું ફૂલ સૌથી સુંદર કહેવાય. એ ફૂલોમાં મહારાજા છે. એનાં પર કવિઓએ કેટલાય કાવ્યો રચ્યાં છે. કોઈ માનસન્માન હોય કે કોઇનું અવસાન હોય, ત્યારે ગુલાબનો હાર પહેરાવવામાં આવે છે.'

રાજકવિએ કહ્યું, 'મહારાજ, જગતમાં શ્રેષ્ઠ ફૂલ તો કમળનું. એ કાદવમાં ખીલે છે, પણ એની શોભા અનુપમ ગણાય છે. કવિઓએ સુંદરતાના વર્ણન માટે હંમેશાં કમળની ઉપમા આપી છે. ખરું સૌંદર્ય શોધવું હોય તો કમળમાં મળે.'

આ સમયે એક ખુશામતખોર મંત્રીએ વિચાર્યું કે રાજાની મહેરબાની મેળવવી હોય તો ચંપાના ફૂલની વાત કરવી પડે. કારણ કે રાજાને એની સુગંધ અતિપ્રિય છે. આથી એણે કહ્યું, 'મહારાજ, ગુલાબ તો ઠીક, કમળની પણ શી વિસાત ? ચંપો એટલે ચંપો ! એની પાસેથી પસાર થાવ અને મનને સુગંધથી તરબતર કરી દે.'

રાજા મંત્રીનો હેતુ પામી ગયા. એમને આવા ખુશામતખોર સલાહકારની જરૃર નહોતી. રાજસભામાં કોઈએ મોગરાના ફૂલને સૌથી શ્રેષ્ઠ કહ્યું, તો કોઇએ રાતરાણીનો મહિમા કર્યો. દરબારના વૃદ્ધ અનુભવી મંત્રીએ કહ્યું, 'મહારાજ, જગતમાં સૌથી વધુ સુંદર ફૂલ તો કપાસનું ગણાય.'

આ સાંભળીને કેટલાક દરબારીઓ ખડખડાટ હસી પડયા. કોઇએ કહ્યું કે કેવી વાત ? કપાસ ન તો સુંદર છે કે ન તો સુગંધિત છે. એને સૌથી સુંદર ફૂલ કહેવું એ તો નરી બેવકૂફી કહેવાય.

રાજાએ વૃદ્ધ દરબારીને પૂછ્યું, 'તમને કપાસનું ફૂલ કેમ સૌથી સુંદર લાગે છે ?'

વૃદ્ધ દરબારીએ કહ્યું, 'મહારાજ, આ ફૂલ એવું છે જે સહુને સમાન રીતે ઉપયોગમાં આવે છે. એમાંથી કપડાં બને છે અને એ વસ્ત્રો રાજા હોય કે રંક, અમીર હોય કે ગરીબ - સહુના તનને ઢાંકે છે. આથી સહુને ઉપયોગી ફૂલ તો કપાસનું.'

વૃદ્ધ મંત્રીનો ઉત્તર સાંભળીને રાજાએ વિચાર્યું કે આ એવો મંત્રી છે, જે પોતાનો નહીં પણ સહુનો વિચાર કરે છે. એમને આખા રાજ્યનું હિત જોનારા સલાહકારની શોધ હતી, તેથી આ વૃદ્ધ મંત્રીને એમણે મુખ્ય સલાહકાર તરીકે ઘોષિત કર્યો.

♠ કાર્ય કરવાની ધગશ ♠

ના નડે કોઈ ઉંમર કે ના આવે એમા બાધ,
ખંતથી કરેલા કામમાં ન આવે કદી ખાધ.

એક વૃદ્ધ શિલ્પી હતો. આખી જીંદગી તેની શિલ્પ તૈયાર કરવામાં વીતાવી હતી. તેમની પાસે અનેક શિષ્યો પણ હતા.

એક દિવસ એક ધનાઢ્ય ઘરમાંથી વિદ્યા શીખવા આવેલા શિષ્યે તેમને ફરીયાદ કરી કે, તમે પેલા એક શિષ્યને વધુ ધ્યાન આપીને શીખવાડો છો. ગુરુને મન તો બધા સરખા હોવા જોઈએ.

ગુરુએ કહ્યું કે, તારી વાત સાચી છે. પરંતુ મારાથી તેના ઉપર ધ્યાન વધુ અપાય જાય છે. ગુરુએ કહ્યું કે, તમે બધા અત્યારે શું કરો છો? હું, તમારી પાસે આવ્યો છું અને બીજા રમતો રમે છે. ગુરુએ કહ્યું કે, તું જેની ફરીયાદ કરે છે તે શિલ્પભવનમાં શું કરે છે?

શ્રીમંત શિષ્યે કહ્યું કે, 'તે તો શિલ્પભવનમાં કોઈક પથ્થરને ઠીક કરે છે. કોણ જાણે ક્યારેય થાકતો નથી.'

ગુરુએ કહ્યું કે, 'જોયું, તારી ફરીયાદ અને પ્રશ્નો જવાબ જ એ છે કે તે આવી રીતે આખો દિવસ વધુ મહેતન કરે છે માટે મારાથી વધારે તેના તરફ ધ્યાન આપોઆપ અપાઈ જાય છે. કારણ કે તે ક્યારેય શિલ્પકળા શીખતાં થાક્યો નથી.'

ગુરુજીએ પેલા શિષ્ય અને શિલ્પભવનમાં ગયા અને ત્યાં જઈને જોયું તો, મીણબત્તીના અજવાળે પેલો શિષ્ય પથ્થરના અમુક ભાગને લિસ્સો કરી રહ્યો હતો.

ગુરુજી બોલ્યા, 'બેટા, હવે રાત પડી તારે આરામ નથી કરવો? કાલે કરજે, થાક નથી લાગ્યો?' પેલો શિષ્ય બોલ્યો કે, 'ના, ના. મારી પાસે કામ ન હોય તો મને થાક લાગે છે.' આવો ધગશથી કામ કરનારો તે શિષ્ય મહાન શિલ્પકાર બન્યો. આજે દુનિયામાં તેને સૌ વિશ્વવિખ્યાત માઈકલ એન્જેલોને નામે ઓળખે છે.

ધ્યેયને પામવાનો જંગ જ્યારે છેડાય છે,
પુરૂષાર્થના બળે બધુ જ મળી જાય છે.

- સાધુ પ્રેમવત્સલદાસજી

♠ महानता का रहस्य ♠

चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस अपने ज्ञान और बुद्धिमता के लिए विश्वविख्यात थे। एक दिन चीन के सम्राट ने उन्हें अपने दरबार में आमंत्रित किया। जब कन्फ्यूशियस दरबार में पहुंचे तो सम्राट ने उनका अभिवादन कर उन्हें उपयुक्त आसन प्रदान किया। जब सभी लोग बैठ गए तो सम्राट ने कन्फ्यूशियस से कहा- मै चाहता हूं कि आप मुझे उस व्यक्ति के पास ले चलें, जो महान कहलाता हो।

कन्फ्यूशियस बोले- '' महाराज, आपसे अधिक महान कौन हो सकता है। आप सत्य को जानने की भावना रखते हैं और जो ऐसी उच्च भावना रखे, वही महान है।''

उनकी बात सुनकर सम्राट ने कहा - '' किंतु मै सोचता हूं कि मुझसे भी महान कोई तो होगा। ''

कन्फ्यूशियस बोले- ''आपसे अधिक महान मै हूं क्योकि सत्य के प्रति मेरा अनुराग है। ''

सम्राट ने फिर प्रश्न उठाया - ''आपसे भी अधिक महान कौन है?''

तब कन्फ्यूशियस ने कहा- यह तो ढूढ़ना पड़ेगा। इतना कहकर वे सम्राट को लेकर चल पड़े। कुछ दूर चलने पर एक वृद्ध कुआं खोदता दिखाई दिया।

उसे देखकर कन्फ्यूशियस बोले - ''सम्राट, मुझसे भी अधिक महान यह वृद्ध है। इसकी काफी आयु बीत चुकी है। शरीर से शिथिल भी हो गया है, फिर भी कुआं खोद रहा है। इसमें परोपकार की भावना है और जिसमें यह भावना हो वही सबसे महान है। ''

♠ सत्संग का प्रभाव ♠

एक राजा बड़ा सनकी था। एक बार सूर्यग्रहण हुआ तो उसने राजपंडितों से पूछा, ‘‘सूर्यग्रहण क्यों होता है?’’

पंडित बोले, ‘‘राहू के सूर्य को ग्रसने से।’’

‘राहू क्यों और कैसे ग्रसता है? बाद में सूर्य कैसे छूटता है?’’

जब उसे इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर नहीं मिले तो उसने आदेश दिया, ‘‘हम खुद सूर्य तक पहुंचकर सच्चाई पता करेंगे। एक हजार घोड़े और घुड़सवार तैयार किए जाएं।’’

राजा की इस बात का विरोध कौन करे? उसका वफादार मंत्री भी चिंतित हुआ। मंत्री का बेटा था वज्रसुमन। उसे छोटी उम्र में ही सारस्वत्य मंत्र मिल गया था, जिसका वह नित्य श्रद्धापूर्वक जप करता था।

गुरुकुल से मिले संस्कारों, मौन व एकांत के अवलंबन से तथा नित्य ईश्वरोपासना से उसकी बुद्धि इतनी सूक्ष्म हो गई थी।

वज्रसुमन को जब पिता की चिंता का कारण पता चला तो उसने कहा, ‘‘पिता जी! मैं भी आपके साथ यात्रा पर चलूंगा।’’

पिता, ‘‘बेटा! राजा की आज्ञा नहीं है। तू अभी छोटा है।’’
नहीं पिता जी! पुरुषार्थ एवं विवेक उम्र के मोहताज नहीं है। मैं राजा को आने वाली विपदा से बचाकर ऐसी सीख दूंगा जिससे वह दोबारा कभी ऐसी आज्ञा नहीं देगा। मंत्री, ‘‘अच्छा ठीक है पर जब सभी आगे निकल जाएं, तब तू धीरे से पीछे-पीछे आना।’’

राजा सैनिकों के साथ निकल पड़ा। चलते-चलते काफिला एक घने जंगल में फंस गया। तीन दिन बीत गए। भूखे-प्यासे सैनिकों और राजा को अब मौत सामने दिखने लगी। हताश होकर राजा ने कहा, ‘‘सौ गुनाह माफ हैं, किसी के पास कोई उपाय हो तो बताओ।’’

मंत्री, ‘‘महाराज! इस काफिले में मेरा बेटा भी है। उसके पास इस समस्या का हल है। आपकी आज्ञा हो तो...’’
‘‘हां-हां, तुरंत बुलाओ उसे।’’

वज्रसुमन बोला, ‘‘महाराज! मुझे पहले से पता था कि हम लोग रास्ता भटक जाएंगे इसीलिए मैं अपनी प्रिय घोड़ी को साथ लाया हूं। इसका दूध-पीता बच्चा घर पर है। जैसे ही मैं इसे लगाम से मुक्त करूंगा, वैसे ही यह सीधे अपने बच्चे से मिलने के लिए भागेगी और हमें रास्ता मिल जाएगा।’’

ऐसा ही हुआ और सब लोग सकुशल राज्य में पहुंच गए।

राजा ने पूछा, ‘‘वज्रसुमन! तुमको कैसे पता था कि हम राह भटक जाएंगे और घोड़ी को रास्ता पता है? यह युक्ति तुम्हें कैसे सूझी?’’

‘‘राजन! सूर्य हमसे करोड़ों कोस दूर है और कोई भी रास्ता सूरज तक नहीं जाता। अत: कहीं न कहीं फंसना स्वाभाविक था।’’

दूसरा, ‘‘पशुओं को परमात्मा ने यह योग्यता दी है कि वे कैसी भी अनजान राह में हों उन्हें अपने घर का रास्ता ज्ञात होता है। यह मैंने सत्संग में सुना था।’’

तीसरा, ‘‘समस्या बाहर होती है, समाधान भीतर होता है। जहां बड़ी-बड़ी बुद्धियां काम करना बंद करती हैं वहां गुरु का ज्ञान, ध्यान और सुमिरन राह दिखाता है। आप बुरा न मानें तो एक बात कहूं?’’

‘‘नि:संकोच कहो।’’

‘‘यदि आप ब्रह्मज्ञानी संतों का सत्संग सुनते, उनके मार्गदर्शन में चलते तो ऐसा कदम कभी नहीं उठाते। अगर राजा सत्संगी होगा तो प्रजा भी उसका अनुसरण करेगी और उन्नत होगी, जिससे राज्य में सुख-शांति और समृद्धि बढ़ेगी।’’

राजा उसकी बातों से बहुत प्रभावित हुआ, बोला, ‘‘मैं तुम्हें एक हजार स्वर्ण मोहरें पुरस्कार में देता हूं और आज से अपना सलाहकार मंत्री नियुक्त करता हूं। अब मैं भी तुम्हारे गुरु जी के सत्संग में जाऊंगा, उनकी शिक्षा को जीवन में लाऊंगा।’’

इस प्रकार एक सत्संगी किशोर की सूझबूझ के कारण पूरे राज्य में अमन-चैन और खुशहाली छा गई।

♠ ક્ષમા ♠

સંત તુકારામના ભજનો સાંભળવા માટે એક માણસ રોજ આવે ખરો, પણ તેસંત તુકારામની પ્રશંસા કરવાને બદલે નિંદા જ કરે ! તુકારામની નિંદા કરવાની એક તક પણ જવા દે નહિ. એક દિવસ તુકારામની ભેંસ ચરતી ચરતી આ માણસના વાડામાં પેસી ગઇ અને વાડામાં પડેલું થોડું ઘાસ ખાઇ ગઇ.

પેલો માણસ કૂદીકૂદીને તુકારામને ગાળો બોલવા લાગ્યો, છતાં તુકારામ મૌન જ રહ્યા. તુકારામનું આવું મૌન જોઇને પેલો માણસ વધુ ઉશ્કેરાયો અને જોરજોરથી ગાળો બોલવા લાગ્યો.

છેવટે તે તુકારામ પર એટલે બધો ગુસ્સે ભરાયો કે તુકારામની પીઠમાં બાવળની એક શૂળ ભોંકી દીધી ! તુકારામે કશું બોલ્યા વિના હળવેથી શૂળ બહાર કાઢી પણ એમ કરતાં તેમની પીઠમાંથી ખૂબ લોહી વહેવા લાગ્યું. સાંજ પડી. ભજનકીર્તનનો સમય થયો.

સંત તુકારામ ભજન ગાવા બેઠા. એ સમયે ભજન સાંભળવા રોજ આવનારા બધા હાજર હતા, પણ પેલો માણસ હાજર નહોતો. તરત જ તુકારામ ઊભા થઇને પેલાના ઘેર પહોંચ્યા અને બોલ્યા, ''ભાઇ,મારી કંઇ ભૂલ થતી હોય તો હું તારી માફી માગું છું, પણ મારી ભૂલના કારણે તું પ્રભુના ભજન ન સાંભળે એ ક્યાંનો ન્યાય ?

ચાલ, ભજન સાંભળવા ચાલ. મારા પરનો રોષ ઈશ્વર પર શા માટે ઠાલવે છે ભલા ?'' તુકારામના આ શબ્દો સાંભળી પેલો માણસ ખાસ શરમાયો. તે ભજનમાં આવ્યો. ભજન પૂરા થયાં એટલે તેણે તુકારામને કહ્યું, ''મને માફ કરો. આપના જેવા ક્ષમાવાન  પર ક્રોધ કરીને મેં મોટું પાપ કર્યું છે.''

♠ સહનશક્તિ ♠

મહાત્મા ગાંધીજી જ્યારે ચંપારણ્યમાં હતા તે સમયની વાત છે. એક દિવસ તેમને કોઈક કામ માટે બેનિયા જવાનું થયું ટ્રેન મારફત તેમને ત્યાં પહોંચવાનું હતું.

ગાંધીજી હંમેશા ટ્રેનમાં ત્રીજા વર્ગમાં મુસાફરી કરતા. તેઓ ઘણી વાર કહેતા, 'મારા હજારો દેશ બાંધવો ગરીબીના કારણે ત્રીજા વર્ગમાં મુસાફરી કરતા હોય તો મારાથી બીજા કે પહેલા વર્ગમાં મુસાફરી કેમ થઈ શકે ?'

એવામાં કોઈ એક પ્રવાસી તેમના ડબ્બામાં ચઢ્યો અને ગાંધીજીના પગ બળપૂર્વક આઘા કરી બોલ્યો, 'એય, આમ પહોળા પગ કરીને બેઠો છે, તો તને કશી શરમ આવતી નથી ! ચાલ સીધો બેસ !'

ગાંધીજીએ તરત જ પોતાના પગ જરા ખેંચી લીધા અને પેલા માણસને બેસવાની જગ્યા કરી આપી. પણ પેલો મુસાફર તો ગાંધીજીને ગાળો આપતો જ રહ્યો. છતાં ગાંધીજીએ મૌન રહી એ બધું શાંતિથી સહન કર્યું. જ્યારે બેનિયા આવ્યું ત્યારે પ્લેટફોર્મથી કેટલાક માણસો ગાંધીજીના ડબ્બા પાસે દોડી આવ્યા અને 'ગાંધીજીની જય' એવા નારા લગાવીને તેમણે ગાંધીજીને હાર-તોરા કર્યા. પેલો પ્રવાસી તો આભો જ બની ગયો. તેને હવે સાચો ખ્યાલ આવ્યો કે પોતે જે માણસને ગાળો બોલી રહ્યો હતો, એ તો મહાત્મા ગાંધીજી છે ! તરત જ તે ગાંધીજીના પગમાં પડયો અને બોલ્યો, 'મને માફ કરો. મેં આપને ઓળખ્યાં નહીં અને તમને ગાળો બોલ્યો !'

ગાંધીજીએ હસીને કહ્યું, 'અરે ભાઈ, તેં મારી સતામણી કરી એ તો ઘણું સારું કહેવાય. કેમ કે એ સતામણી તો મારી સહનશક્તિ માટે એક કસોટીરૃપ બની. ઈશ્વરકૃપાએ હું એ કસોટીમાંથી પાર ઊતર્યો. આ  માટે મારે તારો આભાર માનવો જોઈએ !'

♠ અંતિમ ઇચ્છા ♠

ભારતની આઝાદી માટેના ૧૮૫૭ના બળવાના મુખ્ય સૂત્રધારો પૈકીના એક તાત્યા ટોપે હતા. તેમને પકડવા અંગ્રેજોએ આકાશ-પાતાળ એક કર્યાં, પણ બધું જ નાકામિયાબ !

છેવટે એક ભારતીય રાજવીએ દગાપૂર્વક તાત્યા ટોપેને પકડાવી દીધા. તાત્યા ટોપેને ફાંસીની સજા થઈ. પણ સદા હાથમાં મોત લઈ ફરનાર તાત્યા ટોપેને ગભરાટને બદલે પરમ પ્રસન્નતા હતી કે પોતે દેશને ખાતર શહાદત વહોરી રહ્યા છે. ફાંસી આપતા પહેલાં તાત્યા ટોપેને પૂછવામાં આવ્યું, 'તારી કોઈ અંતિમ ઈચ્છા ?'

ખુમારીથી જવામર્દે કહ્યું, ''તમે મારી અંતિમ ઈચ્છા પૂરી કરવાનું સામર્થ્ય ધરાવતા નથી ! એ સામર્થ્ય તો મારા દેશબાંધવો જ ધરાવે છે, જેઓ જરૂર એક દિવસ તમને અંગ્રેજોને ભારતની ધરતી પરથી હાંકી કાઢશે અને મારા દેશને સ્વતંત્ર કરશે. તેઓ જ દેશને સ્વતંત્ર કરવાની મારી અંતિમ ઈચ્છા પૂરી કરશે. મને પૂરી ખાતરી છે કે તમારે અવશ્ય એક દિવસ મારો દેશ છોડી ચાલ્યા જવું પડશે ! ''

અને પછી તેઓને ફાંસી-ટોપી પહેરાવ્યા જલ્લાદ આગળ આવ્યો તો તાત્યા ટોપેએ કહ્યું, 'ભાઈ, એની મને જરૃર નથી. આ ટોપી તો ફાંસીથી ગભરાતા કાયર લોકો માટે છે. લાવ, રસ્સીનો ગાળિયો ! હું જાતે જ, ખુલ્લી આંખે મારા ગળામાં ભેરવી દઈશ.' અને જાતે જ તેમણે ફાંસીનો ગાળિયો પોતાના ગળામાં નાખ્યો!

♠ वस्तु का सही मूल्य ♠


भगवान् बुद्ध के एक अनुयायी ने कहा, ” प्रभु ! मुझे आपसे एक निवेदन करना है” बुद्ध: बताओ क्या कहना है ?

अनुयायी: मेरे वस्त्र पुराने हो चुके हैं . अब ये पहनने लायक नहीं रहे . कृपया मुझे नए वस्त्र देने का कष्ट करें !

बुद्ध ने अनुयायी के वस्त्र देखे , वे सचमुच बिलकुल जीर्ण हो चुके थे और जगह जगह से घिस चुके थे। इसलिए उन्होंने एक अन्य अनुयायी को नए वस्त्र देने का आदेश दे दिए।

कुछ दिनों बाद बुद्ध अनुयायी के घर पहुंचे।

बुद्ध : क्या तुम अपने नए वस्त्रों में आराम से हो ? तुम्हे और कुछ तो नहीं चाहिए ?

अनुयायी: धन्यवाद प्रभु . मैं इन वस्त्रों में बिल्कुल आराम से हूँ और मुझे और कुछ नहीं चाहिए।

बुद्ध: अब जबकि तुम्हारे पास नए वस्त्र हैं तो तुमने पुराने वस्त्रों का क्या किया ? अनुयायी: मैं अब उसे ओढने के लिए प्रयोग कर रहा हूँ ?

बुद्ध: तो तुमने अपनी पुरानी ओढ़नी का क्या किया ?

अनुयायी: जी मैंने उसे खिड़की पर परदे की जगह लगा दिया है l

बुद्ध: तो क्या तुमने पुराने परदे फ़ेंक दिए ?

अनुयायी: जी नहीं , मैंने उसके चार टुकड़े किये और उनका प्रयोग रसोई में गरम पतीलों को आग से उतारने के लिए कर रहा हूँ l

बुद्ध: तो फिर रसॊइ के पुराने कपड़ों का क्या किया ?
अनुयायी: अब मैं उन्हें पोछा लगाने के लिए प्रयोग करूँगा l

बुद्ध: तो तुम्हारा पुराना पोछा क्या हुआ ?

अनुयायी: प्रभु वो अब इतना तार -तार हो चुका था कि उसका कुछ नहीं किया जा सकता था , इसलिए मैंने उसका एक -एक धागा अलग कर दिए की बातियाँ तैयार कर लीं। उन्ही में से एक कल रात आपके कक्ष में प्रकाशित था।

बुद्ध अनुयायी से संतुष्ट हो गए। वो प्रसन्न थे कि उनका शिष्य वस्तुओं को बर्बाद नहीं करता और उसमे समझ है कि उनका उपयोग किस तरह से किया जा सकता है।

♠ श्रेष्ठ जल ♠

एक दिन बादशाह ने अपने सभी दरबारियों से प्रश्न किया - 'बता सकते हो कि किस नदी का जल श्रेष्ठ है?'
अधिकांश लोगों ने गंगा के जल को श्रेष्ठ बताया। कुछ ने गोदावरी के जल को।

जब बीरबल से पूछा गया तो वह बाले - 'यमुना का जल श्रेष्ठ है।'

बादशाह ने कहा 'क्या बात करते हो? दुनिया जानती है कि गंगाजल श्रेष्ठ है, तुम्हारे धर्मग्रन्थ भी यही कहते हैं।'

बीरबल बोले - 'जहांपनाह! मैं गंगाजल को अमृत मानता हूं। इसलिए आप उससे किसी जल की तुलना मत कीजिए। वह तो अमृत है। रही बात नदियों के जल की, उनमें तो आपके राज्य की यमुना ही है, जिसका जल सबसे अच्छा है।'

बादशाह मुस्करा कर रह गए। बीरबल के तर्क भी लाजवाब थे।

♠ सच्चा धन - पुरूषार्थ ♠


विक्रमादित्य उज्जैन के अनुश्रुत राजा थे, जो अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार की बात है उनके पास सामुद्रिक लक्षण जानने वाला एक ज्योतिषी पहुँचा। विक्रमादित्य का हाथ देखकर वह चिंतामग्न हो गया। उसके शास्त्र के अनुसार तो राजा दीन, दुर्बल और कंगाल होना चाहिए था, लेकिन वह तो सम्राट थे, स्वस्थ थे। लक्षणों में ऐसी विपरीत स्थिति संभवतः उसने पहली बार देखी थी।

ज्योतिषी की दशा देखकर विक्रमादित्य उसकी मनोदशा समझ गए और बोले कि 'बाहरी लक्षणों से यदि आपको संतुष्टि न मिली हो तो छाती चीरकर दिखाता हूँ, भीतर के लक्षण भी देख लीजिए।'

इस पर ज्योतिषी बोला - 'नहीं, महाराज! मैं समझ गया कि आप निर्भय हैं, पुरूषार्थी हैं, आपमें पूरी क्षमता है। इसीलिए आपने परिस्थितियों को अनुकूल बना लिया है और भाग्य पर विजय प्राप्त कर ली है।

यह बात आज मेरी भी समझ में आ गई है कि 'युग मनुष्य को नहीं बनाता, बल्कि मनुष्य युग का निर्माण करने की क्षमता रखता है यदि उसमें पुरूषार्थ हो, क्योंकि एक पुरूषार्थी मनुष्य में ही हाथ की लकीरों को बदलने की सामर्थ्य होता है l

सौजन्य :-

'' SANSKAR '' Fb page