♠ स्वामी विवेकानंद जी का भाषण ♠

विश्व धर्म सम्मेलन में दिया गया संदेश
शिकागो, 11 सितंबर 1893

अमेरिका के बहनों और भाइयों…

आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय बेहद प्रसन्नता से भर गया है. मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा की तरफ से धन्यवाद देता हूँ. मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद कहूँगा और सभी जाति, संप्रदाय के लाखों, करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से आपका कृतज्ञता व्यक्त करता हूं. मेरा धन्यवाद उन कुछ वक्ताओं के लिये भी है जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूरपूरब के देशों से फैला है. मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक ग्रहण करने का पाठ पढ़ाया है.

हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में ही स्वीकार करते हैं. मुझे बेहद गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूँ, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों के अस्वस्थ और अत्याचारित लोगों को शरण दी है. मुझे यह बताते हुए बहुत गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन इजराइलियों की पवित्र स्मृति याँ संभालकर रखी हैं, जिनके धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़-तोड़कर नष्ट कर दिया था और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी. मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ , जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और अभी भी उन्हें प्यार से पाल-पोस रहा है. भाइयों, मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियाँ सुनाना चाहूँगा जिसे मैंने अपने बचपन से स्मरण किया और दोहराया है और जो रोज करोड़ों लोगों द्वारा हर दिन दोहराया जाता है, जिस तरह बिलकुल भिन्न स्त्रोतों से निकली विभिन्न नदियाँ अंत में समुद्र में जाकर मिलती हैं, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है. वे देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें, पर सभी भगवान तक ही जाते हैं.

वर्तमान सम्मेलन जो कि आज तक की सबसे पवित्र समारोहों में से है, गीता में बताए गए इस सिद्धांत का प्रमाण है – जो भी मुझ तक आता है, चाहे फिर वह कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं. लोग चाहे कोई भी रास्ता चुनें, आखिर में मुझ तक ही पहुँचते हैं. सांप्रदायिकताएँ, धर्माधता और इसके भयानक वंशज हठधमिर्ता लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं. इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है. कितनी बार ही यह भूमि खून से लाल हुई है. कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं. अगर ये भयानक दैत्य नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है. मुझे पूरी आशा है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगे.

स्वामी विवेकानंद का अंतिम सेशन में दिया गया संदेश

उन सभी महान आत्माओ का मै शुक्रियादा करता हु जिनका बड़ा ह्रदय हो और जिनमे प्यार की सच्चाई हो और जिन्होंने प्रभुत्व की सच्चाई का अनुभव कीया हो. उदार एवं भावुकता को दिखाने वालो का भी मै शुक्रियादा करना चाहता हु. मै उन सभी श्रोताओ का भी शुक्रियादा करना चाहता हु जिन्होंने शांति पूर्वक हमारे धार्मिक विचारो को सुना और अपनी सहमति दर्शायी. इस सम्मेलन की सभी मधुर बाते मुझे समय-समय पर याद आती रहेंगी. उन सभी का मै विशेष शुक्रियादा करना चाहता हु जिन्होंने अपनी उपस्थिति से मेरे विचारो को और भी महान बनाया.

बहोत सी बाते यहाँ धार्मिक एकता को लेकर ही कही गयी थी. लेकीन मै यहाँ स्वयं के भाषण को साहसिक बताने के लिये नही आया हु. लेकीन यहाँ यदि किसी को यह आशा है की यह एकता किसी के लिये या किसी एक धर्म के लिये सफलता बनकर आएँगी और दूसरे के लिए विनाश बनकर आएँगी, तो मै उन्हेंसे कहना चाहता हु की, “भाइयो, आपकी आशा बिल्कुल असंभव है.”

क्या मै धार्मिक एकता में किसी क्रिस्चियन को हिन्दू बनने के लिए कह रहा हु?

भगवान ऐसा करने से हमेशा मुझे रोकेंगे.

क्या मै किसी हिन्दू या बुद्ध को क्रिस्चियन बनने के लिये कह रहा हु? निश्चित ही भगवान ऐसा नही होने देंगे. बीज हमेशा जमीन के निचे ही बोये जाते है और धरती और हवा और पानी उसी के आसपास होते है. तो क्या वह बीज धरती, हवा और पानी बन जाता है? नही ना. बल्कि वह एक पौधा बन जाता है. वह अपने ही नियमो के तहत बढ़ता जाता है. साधारण तौर पर धरती, हवा और पानी भी उस बीज में मिल जाते है और एक पौधे के रूप में जीवित हो जाते है.

और ऐसा ही धर्म के विषय में भी होता है. क्रिस्चियन कभी भी हिन्दू नही बनेगा और एक बुद्धिस्ट और हिन्दू कभी क्रिस्चियन नही बनेंगे. लेकिन धार्मिक एकता के समय हमें विकास के नियम पर चलते समय एक दुसरे को समझकर चलते हुए विकास करने की जरुरत है. यदि विश्व धर्म सम्मेलन दुनिया को यदि कुछ दिखा सकता है तो वह यह होंगा- धर्मो की पवित्रता, शुद्धता और पुण्यता.

क्योकि धर्मो से ही इंसान के चरित्र का निर्माण होता है, यदि धार्मिक एकता के समय भी कोई यह सोचता है की उसी के धर्म का विस्तार हो और दुसरे धर्मो का विनाश हो तो ऐसे लोगो के लिये मुझे दिल से लज्जा महसुस होती है. मेरे अनुसार सभी धर्मो के धर्मग्रंथो पर एक ही वाक्य लिखा होना चाहिये :

” मदद करे और लडे नही” “एक दूजे का साथ दे, ना की अलग करे” “शांति और करुणा से रहे, ना की हिंसा करे”.

♠ भगवान की भलाई ♠

एक दार्शनिक अपने एक शिष्य के साथ कहीं से गुजर रहा था। चलते-चलते वे एक खेत के पास पहुंचे। खेत अच्छी जगह स्थित था लेकिन उसकी हालत देखकर लगता था मानो उसका मालिक उस पर जरा भी ध्यान नहीं देता है।

खैर, दोनों को प्यास लगी थी सो वे खेत के बीचो-बीच बने एक टूटे-फूटे घर के सामने पहुंचे और दरवाज़ा खटखटाया।

अन्दर से एक आदमी निकला, उसके साथ उसकी पत्नी और तीन बच्चे भी थे। सभी फटे-पुराने कपड़े पहने हुए थे।

दार्शनिक बोला, “ श्रीमान, क्या हमें पानी मिल सकता है? बड़ी प्यास लगी है!”

“ज़रूर!”, आदमी उन्हें पानी का जग थमाते हुए बोला।

“मैं देख रहा हूँ कि आपका खेत इनता बड़ा है पर इसमें कोई फसल नही बोई गयी है, और ना ही यहाँ फलों के वृक्ष दिखायी दे रहे हैं…तो आखिर आप लोगों का गुजारा कैसे चलता है?”, दार्शनिक ने प्रश्न किया।

“जी, हमारे पास एक भैंस है, वो काफी दूध देती है उसे पास के गाँव में बेच कर कुछ पैसे मिल जाते हैं और बचे हुए दूध का सेवन कर के हमारा गुजारा चल जाता है।”
आदमी ने समझाया।

दार्शनिक और शिष्य आगे बढ़ने को हुए तभी आदमी बोला, “ शाम काफी हो गयी है, आप लोग चाहें तो आज रात यहीं रुक जाएं!”

दोनों रुकने को तैयार हो गए।

आधी रात के करीब जब सभी गहरी नींद में सो रहे थे तभी दार्शनिक ने शिष्य को उठाया और बोला, “चलो हमें अभी यहाँ से चलना है, और चलने से पहले हम उस आदमी की भैंस को चट्टान से गिराकर मार डालेंगे।”

शिष्य को अपने गुरु की बात पर यकीन नहीं हो रहा था पर वो उनकी बात काट भी नहीं सकता था।

दोनों भैंस को मार कर रातों-रात गायब हो गए!

यह घटना शिष्य के जेहन में बैठ गयी और करीब 10 साल बाद जब वो एक सफल उद्यमी बन गया तो उसने सोचा क्यों न अपनी गलती का पश्चाताप करने के लिए एक बार फिर उसी आदमी से मिला जाए और उसकी आर्थिक मदद की जाए।

अपनी चमचमाती कार से वह उस खेत के सामने पहुंचा।

शिष्य को अपनी आँखों पे यकीन नहीं हो रहा था। वह उजाड़ खेत अब फलों के बागीचे में बदल चुका था… टूटे-फूटे घर की जगह एक शानदार बंगला खड़ा था और जहाँ अकेली भैंस बंधी रहती थी वहां अच्छी नस्ल की कई गाएं और भैंस अपना चारा चर रही थीं।

शिष्य ने सोचा कि भैंस के मरने के बाद वो परिवार सब बेच-बाच कर कहीं चला गया होगा और वापस लौटने के लिए वो अपनी कार स्टार्ट करने लगा कि तभी उसे वो दस साल पहले वाला आदमी दिखा।

“ शायद आप मुझे पहचान नहीं पाए, सालों पहले मैं आपसे मिला था।”, शिष्य उस आदमी की तरफ बढ़ते हुए बोला।

“नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है, मुझे अच्छी तरह याद है, आप और आपके गुरु यहाँ आये थे…कैसे भूल सकता हूँ उस दिन को; उस दिन ने तो मेरा जीवन ही बदल कर रख दिया। आप लोग तो बिना बताये चले गए पर उसी दिन ना जाने कैसे हमारी भैंस भी चट्टान से गिरकर मर गयी। कुछ दिन तो समझ ही नहीं आया कि क्या करें, पर जीने के लिए कुछ तो करना था, सो लकड़ियाँ काट कर बेचने लगा, उससे कुछ पैसे हुए तो खेत में बोवाई कर दी… सौभाग्य से फसल अच्छी निकल गयी, बेचने पर जो पैसे मिले उससे फलों के बागीचे लगवा दिए और यह काम अच्छा चल पड़ा और इस समय मैं आस-पास के हज़ार गाँव में सबसे बड़ा फल व्यापारी हूँ…सचमुच, ये सब कुछ ना होता अगर उस भैंस की मौत ना हुई होती !

“लेकिन यही काम आप पहले भी कर सकते थे?”, शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।

आदमी बोला, “ बिलकुल कर सकता था! पर तब ज़िन्दगी बिना उतनी मेहनत के आराम से चल रही थी, कभी लगा ही नहीं कि मेरे अन्दर इतना कुछ करने की क्षमता है सो कोशिश ही नहीं की पर जब भैंस मर गयी तब हाथ-पाँव मारने पड़े और मुझ जैसा गरीब-बेहाल इंसान भी इस मुकाम तक पहुँच पाया।”

आज शिष्य अपने गुरु के उस निर्देश का असली मतलब समझ चुका था और बिना किसी पश्चाताप के वापस लौट पा रहा था।

Friends, कई बार हम परिस्थितियों के इतने आदि हो जाते हैं कि बस उसी में जीना सीख लेते हैं, फिर चाहे वो परिस्थितियां बुरी ही क्यों न हों!

हम अपनी जॉब से नफरत करते हैं पर फिर भी उसे पकड़े-पकड़े ज़िन्दगी बिता देते हैं, तो कई बार हम बस इसलिए नये business के बारे में नहीं सोचते क्योंकि हमारा मौजूदा बिजनेस दाल-रोटी भर का खर्चा निकाल देता है! पर ऐसा करने में हम कभी भी अपने full potential को realize नहीं कर पाते हैं और बहुत सी ऐसी चीजें करने से चूक जाते हैं जिन्हें करने की हमारे अन्दर क्षमता है और जो हमारी life को कहीं बेहतर बना सकती हैं।

सोचिये, कहीं आपकी ज़िन्दगी में भी तो कोई ऐसी भैंस नहीं जो आपको एक बेहतर ज़िन्दगी जीने से रोक रही है…कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको लग रहा है कि आपने उस भैंस को बाँध कर रखा है जबकि असलियत में उस भैंस ने आपको बाँध रखा है! और अगर आपको लगे कि ऐसा है, तो आगे बढिए…हिम्मत करिए, अपनी रस्सी को काटिए; आजाद होइए…..

समस्या के बारे में सोचने से "बहाने" मिलते है पर..
समाधान के बारे में सोचने पर "रास्ते" मिलते है ।

♠ संवेदनशीलता ♠


एक पोस्टमैन ने एक घर के दरवाजे पर दस्तक देते हुए कहा,"चिट्ठी ले लीजिये।"

अंदर से एक बालिका की आवाज आई,"आ रही हूँ।"

लेकिन तीन-चार मिनट तक कोई न आया तो पोस्टमैन ने फिर कहा,"अरे भाई!मकान में कोई है क्या,अपनी चिट्ठी ले लो।"

लड़की की फिर आवाज आई,"पोस्टमैन साहब,दरवाजे के नीचे से चिट्ठी अंदर डाल दीजिए,मैं आ रही हूँ।"

पोस्टमैन ने कहा,"नहीं, मैं खड़ा हूँ, रजिस्टर्ड चिट्ठी है, पावती पर तुम्हारे साइन चाहिये।"

करीबन छह-सात मिनट बाद दरवाजा खुला। पोस्टमैन इस देरी के लिए  झल्लाया हुआ तो था ही और उस पर चिल्लाने वाला था ही, लेकिन दरवाजा खुलते ही वह चौंक गया, सामने एक अपाहिज कन्या जिसके पांव नहीं थे, सामने खड़ी थी। पोस्टमैन चुपचाप पत्र देकर और उसके साइन लेकर चला गया। हफ़्ते, दो हफ़्ते में जब कभी उस लड़की के लिए डाक आती, पोस्टमैन एक आवाज देता और जब तक वह कन्या न आती तब तक खड़ा रहता।

एक दिन उसने पोस्टमैन को नंगे पाँव देखा। दीपावली नजदीक आ रही थी। उसने सोचा पोस्टमैन को क्या ईनाम दूँ। एक दिन जब पोस्टमैन डाक देकर चला गया,तब उस लड़की ने,जहां मिट्टी में पोस्टमैन के पाँव के निशान बने थे, उन पर काग़ज़ रख कर उन पाँवों का चित्र उतार लिया। अगले दिन उसने अपने यहाँ काम करने वाली बाई से उस नाप के जूते मंगवा लिये। दीपावली आई और उसके अगले दिन पोस्टमैन ने गली के सब लोगों से तो ईनाम माँगा और सोचा कि अब इस बिटिया से क्या इनाम लेना? पर गली में आया हूँ तो उससे मिल ही लूँ।

उसने दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई,"कौन?"पोस्टमैन, उत्तर मिला।

बालिका हाथ में एक गिफ्ट पैक लेकर आई और कहा,"अंकल, मेरी तरफ से दीपावली पर आपको यह भेंट है।"

पोस्टमैन ने कहा,"तुम तो मेरे लिए बेटी के समान हो, तुमसे मैं गिफ्ट कैसे लूँ?" कन्या ने आग्रह किया कि मेरी इस गिफ्ट के लिए मना नहीं करें।"

ठीक है कहते हुए पोस्टमैन ने पैकेट ले लिया। बालिका ने कहा,"अंकल इस पैकेट को घर ले जाकर खोलना।

घर जाकर जब उसने पैकेट खोला तो विस्मित रह गया, क्योंकि उसमें एक जोड़ी जूते थे।उसकी आँखें भर आई। अगले दिन वह ऑफिस पहुंचा और पोस्टमास्टर से फरियाद की कि उसका तबादला फौरन कर दिया जाए। पोस्टमास्टर ने कारण पूछा,तो पोस्टमैन ने वे जूते टेबल पर रखते हुए सारी कहानी सुनाई और भीगी आँखों और रुंधे कंठ से कहा,"आज के बाद मैं उस गली में नहीं जा सकूँगा। उस अपाहिज बच्ची ने तो मेरे नंगे पाँवों को तो जूते दे दिये पर मैं उसे पाँव कैसे दे पाऊँगा?"

संवेदनशीलता का यह श्रेष्ठ दृष्टांत है। संवेदनशीलता यानि,दूसरों के दुःख-दर्द को समझना, अनुभव करना और उसके दुःख-दर्द में भागीदारी करना,उसमें शरीक होना। यह ऐसा मानवीय गुण है जिसके बिना इंसान अधूरा है।
ईश्वर से प्रार्थना है कि वह हमें संवेदनशीलता रूपी आभूषण प्रदान करें ताकि हम दूसरों के दुःख-दर्द को कम करने में योगदान कर सकें।संकट की घड़ी में कोई यह नहीं समझे कि वह अकेला है, अपितु उसे महसूस हो कि सारी मानवता उसके साथ है।

♠ એક ટીપાંનું મૂલ્ય ♠

રૉકફેલર અમેરિકાના પૈસાદાર વ્યક્તિઓમાંના એક હતાં.વાત તે દિવસોની છે,જ્યારે તેમણે તેલની કંપની શરૂ કરી હતી ત્યારે તે પણ ક્યારેક મશીનોની દેખરેખ કરતા હતાં.એક દિવસ તે એક મશીનને ખૂબ જ ધ્યાનથી જોઇ રહ્યાં હતાં.તે મશીન તેલથી ભરેલાં કૅનોને ટિનનાં ટાંકાથી બંધ કરતું હતું.તેમણે ગણ્યું કે એક કૅનનાં ટાંકામાં ટિનમાંથી 39 ટીપાં ઉપયોગમાં આવી રહ્યાં હતાં. રૉકફેલરે ફોરમેનને પૂછયું કે ઢાંકણ બંધ કરવામાં કેટલાં ટીપાની જરૂર પડે છે? ફોરમેન વિચારમાં પડી ગયો.તેની તપાસણી થઇ.તપાસણી કરતાં નક્કી થયું કે 38 ટીપાથી પણ તેને એટલી જ સુદ્રઢતાથી બંધ કરી શકાય છે જેટલામાં 39 ટીપાં વપરાતા હતાં.એક વર્ષ પછી ગણતરી કરતાં ખબર પડી કે એક બુંદ પ્રતિ કૅનની બચતથી સાડા સાત લાખ ડોલરની વધારે આવક થઇ હતી.

મિત્રો, આ તો થઇ માત્ર એક ટીપાનાં મૂલ્યની વાત.પણ જો શાંતચિત્તે વિચારવામાં આવે તો જીવનની એકેક ક્ષણ,મિનિટ,કલાક,દિવસ અને વર્ષ એટલાં જ મૂલ્યવાન છે જેટલું મૂલ્યવાન રૉકફેલરને મન એક ટીપું હતું.

♠ સંત તુકારામની ઇશ્વરભક્તિ ♠

સંત તુકારામના નિંદકને એક નવી તક મળી ગઇ. આજ સુધી તો તુકારામના ઘેર એ અભંગ સાંભળવા જતો અને જેવાં ભજન પૂરાં થતાં કે તરત બહાર નીકળીને સંતની નિંદા કરવા લાગતો.

નિંદા કરનાર હંમેશાં નવી નવી તક શોધતો હોય છે. એક નવી સુંદર તક આ નિંદકને મળી ગઇ. બન્યું એવું કે તુકારામની ભેંસ ચરતી ચરતી એના વાડામાં પેસી ગઇ અને થોડું ઘાસ ખાઇ ગઇ.

ટીકા કરવાની તક શોધનારને સામે ચાલીને ગુસ્સે થવાનો અવસર મળ્યો. આથી એ તુકારામને અપશબ્દ કહેવા લાગ્યો. એમને કહ્યું, ''તમે રોજ ભગવાનની ભક્તિ કરો છો, પરંતુ તમારી ભક્તિ એ તો દંભ અને આડંબર છે. હવે ભજન ગાવાં મૂકી દો. પહેલાં ભેંસનું ધ્યાન રાખો. સમજ્યાને બગભગત.''
તુકારામ મૌન રહ્યા એટલે નિંદકે જોરથી બરાડા પાડતા કહ્યું,''મારી વાત તમને સંભળાય છે ખરી ? તમે પાખંડીઓની અને કર્મકાંડીઓની ટીકા કરો છો, પણ સૌથી મોટા પાખંડી તો તમે છો ?''

તુકારામ શાંતિથી સાંભળી રહ્યા એટલે પેલાનો ગુસ્સો ફાટી નીકળ્યો. બાજુમાં જ બાવળની શૂળ હતી, તે લઇને તુકારામની પીઠમાં ભોંકી દીધી. નિંદકનો ગુસ્સો માંડ ઠર્યો. સંત તુકારામે હળવેથી શૂળ બહાર કાઢી નાખી અને પીઠમાં નીકળેલા લોહીને લૂછી નાખ્યું. સાંજ પડી. ભજનની વેળા થઇ. પેલો નિંદક આવ્યો નહીં. તુકારામે જોયું કે ભજન સાંભળવા આવનારા સહુ કોઇ હાજર હતા, માત્ર પેલો નિંદક હાજર નહોતો, તેથી  ઊભા થઇને એને ઘેર ગયા. બે હાથ જોડી વિનંતી કરી અને કહ્યું,
''ભાઇ, મારી ભૂલ થઇ હોય તો મને સજા કર, પરંતુ એને કારણે તું પ્રભુભજન સાંભળે નહીં તે કેમ ચાલે ! મારા પરનો ગુસ્સો ઈશ્વર પર ઉતારે, તે કેમ ચાલે ?'' ચાલ, ભજન સાંભળવા ચાલ.''

સંતની ઈશ્વરભક્તિ જોઇને નિંદક શરમ અનુભવવા લાગ્યો. એ તુકારામની સાથે ભજન સાંભળવા માટે પાછો આવ્યો. ભજન પૂરાં થતાં એણે તુકારામને કહ્યું, ''મને માફ કરો. મેં એક નહીં, પણ અનેક દુષ્કૃત્ય કર્યાં છે. વિના કારણે આપની નિંદા કરી.

અપશબ્દોનો વરસાદ વરસાવ્યો. તક મળતા પીઠમાં શૂળ ભોંકી. જ્યારે તમે આવા નિંદક અને ક્રોધી તરફ કેટલી બધી ક્ષમા દાખવી ! આપના જેવા અક્રોધી સંત પર શબ્દ અને શૂળના પ્રહાર કરીને મેં મહાપાપ કર્યું છે. મને માફ કરો.''


♠ विवेकानंद का मातृप्रेम ♠


एक बार स्वामी विवेकानन्द जी अमेरिका में एक सम्मलेन में भाग ले रहे थे. सम्मलेन के बाद कुछ पत्रकारों ने उन से भारत की नदियों के बारे में एक प्रश्न पूछा.
पत्रकार ने पूछा – स्वामी जी आप के देश में किस नदी का जल सबसे अच्छा है?

स्वामी जी का उत्तर था – यमुना का जल सभी नदियों के जल से अच्छा है l
पत्रकार ने फिर पूछा – स्वामी जी आप के देशवासी तो बोलते है कि गंगा का जल सब से अच्छा है.

स्वामी जी का उत्तर था – कौन कहता है गंगा नदी है, गंगा हमारी माँ है और उस का नीर जल नहीं है, – अमृत है.

यह सुन कर वहाँ बैठे सभी लोग स्तब्ध रह गये और सभी स्वामी जी के सामने निरुत्तर हो गये.

♠ सच्चा आत्म-समर्पण ♠

थाईजेन्ड ग्रीनलैण्ड पार्क में स्वामी विवेकानन्द का ओजस्वी भाषण हुआ। उन्होंने संसार के नव-निर्माण की आवश्यकता का प्रतिपादन करते हुए कहा- ‘‘यदि मुझे सच्चा आत्म-समर्पण करने वाले बीस लोक-सेवक मिल जायें, तो दुनिया का नक्शा ही बदल दूँ।”

भाषण बहुत पसन्द किया गया और उसकी सराहना भी की गई, पर सच्चे आत्म-समर्पण वाली माँग पूरा करने के लिए एक भी तैयार न हुआ।

दूसरे दिन प्रातःकाल स्वामीजी सोकर उठे तो उन्हें दरवाजे से सटी खड़ी एक महिला दिखाई दी। वह हाथ जोड़े खड़ी थी।

स्वामीजी ने उससे इतने सवेरे इस प्रकार आने का प्रयोजन पूछा, तो उसने रूंधे कंठ और भरी आँखों से कहा- भगवन्! कल आपने दुनिया का नक्शा बदलने के लिए सच्चे मन से आत्म-समर्पण करने वाले बीस साथियों की माँग की थी। उन्नीस कहाँ से आयेंगे यह मैं नहीं जानती, पर एक मैं आपके सामने हूँ। इस समर्पित मन और मस्तिष्क का आप चाहे जो उपयोग करें।

स्वामी विवेकानन्द गद्-गद् हो गये। इस भद्र महिला को लेकर वे भारत आये। उसने हिन्दू साध्वी के रूप में नव-निर्माण के लिए जो अनुपम कार्य किया उसे कौन नहीं जानता। वह महिला थी भगिनी निवेदिता- पूर्व नाम था मिस नोबल।

♠ આભડછેટનું ભૂત ♠

મહાત્મા ગાંધીબાપુના સમયની વાત છે. ગાંધીબાપુએ અશ્પૃશ્યતા નિવારણ માટેની ઝુંબેશ ઉપાડી હતી અને એની ઝુંબેશને એમના ચુસ્ત અનુયાયીઓનો ટેકો હતો.

આવાજ એક કેળવણી નિરીક્ષક સ્કૂલના ઈન્સ્પેકશન માટે કોઈ ગામડામાં ગયા. કેળવણી નીરિક્ષક ઈન્સ્પેકશન માટે ગામમાં પહોંચે તે પહેલાં તો તે પ્રખર અશ્પૃશ્યતા નિવારણ ઝુંબેશના હિમાયતી છે, કડક સ્વભાવના છે, શિસ્તના આગ્રહી છે તેવી તેમની ખ્યાતિ પહોંચી ગયેલી.

એટલે ગામની શાળાના હેડમાસ્તરે દરેક વર્ગ શિક્ષકને કહી રાખેલું કે, ''જુઓ ! કેળવણી નીરિક્ષક ઈન્સપેક્ટર ઇન્સ્પેકશન માટે આવે છે એટલે તમે સ્વચ્છતાની સાથોસાથ આભડછેટના ભૂતથી આઘા ભાગજો, નિરીક્ષકને એમ ના લાગવું જોઈએ કે આપણે આભડછેટમાં માનીએ છે. વિદ્યાર્થીઓને પણ એ જ રીતે બેસાડજો.''

આથી દરેક શિક્ષિકે પોતપોતાના કલાસમાં દરેક જાતિના વિદ્યાર્થીઓને પણ સાથે જ બેસાર્યા - સર્વણો-દલિતો-મુસ્લિમોને એક સાથે બેસાર્યા- એક બ્રાહ્મણ વિદ્યાર્થી હોય તો તેની બાજુમાં હરિજન દલિત હોય - બાજુમાં મુસ્લિમ હોય- તો તેની બાજુમાં દેવીપૂજક હોય- દેવીપૂજકની બાજુમાં ક્ષત્રિય હોય. વળી પાણી પીવાનું પાત્ર અને પવાલું પણ એક જ રાખ્યું હતું.

નીરિક્ષક આવ્યા - દરેક કલાસરૃમમાં જઈ નિરીક્ષણ કર્યું - પણ દરેક કલાસમાં એક જ જાતની બેઠક વ્યવસ્થા જોઈ વ્હેમાણાં, એટલે એમણે શિક્ષકોએ આ વ્યવસ્થા આજના ઈન્સ્પેકશનના દિવસ પૂરતી રાખી છે કે કાયમની છે એ જાણવા તેમણે યુક્તિ કરી. દરેક શિક્ષકના ચહેરા પર રાહતના ભાવ હતા, અચાનક કેળવણી નીરિક્ષક એક કલાસમાં પાછા આવ્યા અને કહ્યું : 'બાળકો, ઈન્સેપકશન પતી ગયું,

હવે તમે બધા ગઈકાલે બેઠા હતા તેમ બેસી જાવ ! આટલું સાંભળતાં જ દલિત વિદ્યાર્થીઓ ઉભા થઈ એક ખૂણામાં અલગ બેસી ગયા - એમને એ રીતે બેસી જતા જોઈ સવર્ણ વિદ્યાર્થીઓના ચહેરા ઉપર રાહતના ભાવ આવી ગયા.'

કેળવણી નિરીક્ષક આચાર્ય અને શિક્ષકના ખભે હાથ મુકી બોલ્યા: ''અશ્પૃશ્યતા ફક્ત વાણી વર્તનમાંથી જ નહિ - પણ દિલમાંથી પણ કાઢવાની કોશિશ કરો - તમે તો આ ભાવિ સમાજના ઘડવૈયા છો. તમારું જે કાંઈ આંદોલન કે કાર્ય હોય એ કુરિવાજને જડમૂળથી ઉખાડવાનું હોવું જોઈએ અને એટલે જ મહાત્મા ગાંધીબાપુએ પણ તેમના સાબરમતી આશ્રમને હરિજન આશ્રમ નામ આપ્યું છે.

હું આવ્યો માટે જ તમે આ વ્યવસ્થા કરી એ મને ન ગમ્યું. આ કુરિવાજને વિદ્યાર્થીઓના દિમાગમાંથી જડમૂળથી કાઢવાનો પ્રયત્ન કરો !''

એ કેળવણી નીરિક્ષક હતા બદરૃદ્દીન તૈયબજી.


♠ जीवन लक्ष्य ♠

अंत तक पढना दोस्तो. जीवन का सही लक्ष्य समझाती एक अनमोल कहानी....

एक नौजवान को सड़क पर चलते समय एक रुपए का सिक्का गिरा हुआ मिला। चूंकि उसे पता नहीं था कि वो सिक्का किसका है, इसलिए उसने उसे रख लिया। सिक्का मिलने से लड़का इतना खुश हुआ कि जब भी वो सड़क पर चलता, नीचे देखता जाता कि शायद कोई सिक्का पड़ा हुआ मिल जाए।

उसकी आयु धीरे-धीरे बढ़ती चली गई, लेकिन नीचे सड़क पर देखते हुए चलने की उसकी आदत नहीं छूटी। वृद्धावस्था आने पर एक दिन उसने वो सारे सिक्के निकाले जो उसे जीवन भर सड़कों पर पड़े हुए मिले थे। पूरी राशि पचास रुपए के लगभग थी। जब उसने यह बात अपने बच्चों को बताई तो उसकी बेटी ने कहा:-

"आपने अपना पूरा जीवन नीचे देखने में बिता दिया और केवल पचास रुपए ही कमाए। लेकिन इस दौरान आपने हजारों खूबसूरत सूर्योदय और सूर्यास्त, सैकड़ों आकर्षक इंद्रधनुष, मनमोहक पेड़-पौधे, सुंदर नीला आकाश और पास से गुजरते लोगों की मुस्कानें गंवा दीं। आपने वाकई जीवन को उसकी संपूर्ण सुंदरता में अनुभव नहीं किया।

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हममें से कितने लोग ऐसी ही स्थिति में हैं। हो सकता है कि हम सड़क पर पड़े हुए पैसे न ढूंढते फिरते हों, लेकिन क्या यह सच नहीं है कि हम धन कमाने और संपत्ति एकत्रित करने में इतने व्यस्त हो गए हैं कि जीवन के अन्य पहलुओं की उपेक्षा कर रहे हैं? इससे न केवल हम प्रकृति की सुंदरता और दूसरों के साथ अपने रिश्तों की मिठास से वंचित रह जाते हैं, बल्कि स्वयं को उपलब्ध सबसे बड़े खजाने-अपनी आध्यात्मिक संपत्ति को भी खो बैठते हैं।

आजीविका कमाने में कुछ गलत नहीं है। लेकिन जब पैसा कमाना हमारे लिए इतना अधिक महत्वपूर्ण हो जाए कि हमारे स्वास्थ्य, हमारे परिवार और हमारी आध्यात्मिक तरक्की की उपेक्षा होने लगे, तो हमारा जीवन असंतुलित हो जाता है। हमें अपने सांसारिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के साथ-साथ अपनी आध्यात्मिक प्रगति की ओर भी ध्यान देना चाहिए। हमें शायद लगता है कि आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का मतलब है सारा समय ध्यानाभ्यास करते रहना, लेकिन सच तो यह है कि हमें उस क्षेत्र में भी असंतुलित नहीं हो जाना चाहिए।

अपनी प्राथमिकताएं तय करते समय हमें रोजाना कुछ समय आध्यात्मिक क्रिया को, कुछ समय निष्काम सेवा को, कुछ समय अपने परिवार को और कुछ समय अपनी नौकरी या व्यवसाय को देना चाहिए। ऐसा करने से हम देखेंगे कि हम इन सभी क्षेत्रों में उत्तम प्रदर्शन करेंगे और एक संतुष्टिपूर्ण जीवन जीते हुए अपने सभी लक्ष्यों को प्राप्त कर लेंगे। समय-समय पर यह देखना चाहिए कि हम अपना लक्ष्य प्राप्त करने में सफल हो भी रहे हैं अथवा नहीं। हो सकता है कि हमें पता चले कि हम अपने करियर या अपने जीवन के आर्थिक पहलुओं की ओर इतना ज्यादा ध्यान दे रहे हैं कि परिवार, व्यक्तिगत विकास और आध्यात्मिक प्रगति की उपेक्षा हो रही है।