♠ सफलता की कोई उम्र नहीं होती ! ♠


'' हम इसलिए खेलना नहीं छोड़ देते क्योंकि हम बूढ़े हो जाते हैं, हम इसलिए बूढ़े हो जाते हैं क्योंकि हम खेलना छोड़ देते हैं! ''

इस संसार में बहुत से लोग ऐसे हैं, जिन्होंने अपने कार्योँ से अपनी उम्र को पीछे छोड़ दिया। यह बात सच है कि हमारे शरीर के कार्य करने की एक सीमा है। उम्र बढ़ने के साथ शरीर के कार्य करने की क्षमता घटती जाती है, लेकिन जिन लोगों के हौसले बुलंद होते हैं, जो जीवन में कुछ कर गुजरने की चाह रखते हैं, जिनमें उत्साह – उमँग होता है, जिनकी इच्छाशक्ति व संकल्पशक्ति मजबूत होती है, ऐसे व्यक्तियों के सामने कोई बाधा बड़ी नहीं होती। ऐसे व्यक्ति आत्मविश्वास से भरे हुयें होते है, जो असंभव को भी संभव बना देते है।

युवा किसी आयु अवस्था का नाम नहीं, बल्क़ि शक्ति का नाम है। जिसने अपने मन और आत्मा की शक्ति को जगा लिया, वह ७० वर्ष की आयु में भी युवा है।

बहुत से लोग उम्र बढ़ने के साथ – साथ सोचने लगते हैं कि अब तो हमारी उम्र हो गयी है, “अब हमसे ये सब नहीं हो सकता”। उनकी यही सोच उन्हें निर्बल बना देती है और कुछ कार्य नहीं करने देती। व्यक्ति जितना अपने शरीर से कार्य करता है, उससे कई गुना कार्य वह अपने मन से करता है। यदि मन की शक्तियाँ ही उसकी कमजोर पड़ गई हैं, तो फिर जरूरत है उन्हें जगाने की।

शक्तियों के जागरण से संबंधित एक ऐतिहासिक कथा याद आती है।

एक राजा के पास कई हाथी थे, लेकिन एक हाथी बहुत शक्तिशाली था, बहुत आज्ञाकारी, समझदार व युद्ध-कौशल में निपुण था। बहुत से युद्धों में वह भेजा गया था और वह राजा को विजय दिलाकर वापस लौटा था, इसलिए वह महाराज का सबसे प्रिय हाथी था। समय गुजरता गया और एक समय ऐसा भी आया, जब वह वृद्ध दिखने लगा। अब वह पहले की तरह कार्य नहीं कर पाता था। इसलिए अब राजा उसे युद्ध क्षेत्र में भी नहीं भेजते थे। एक दिन वह सरोवर में जल पीने के लिए गया, लेकिन वहीं कीचड़ में उसका पैर धँस गया और फिर धँसता ही चला गया। उस हाथी ने बहुत कोशिश की, लेकिन वह उस कीचड़ से स्वयं को नहीं निकाल पाया। उसकी चिंघाड़ने की आवाज से लोगों को यह पता चल गया कि वह हाथी संकट में है। हाथी के फँसने का समाचार राजा तक भी पहुँचा।

राजा समेत सभी लोग हाथी के आसपास इक्कठा हो गए और विभिन्न प्रकार के शारीरिक प्रयत्न उसे निकालने के लिए करने लगे। जब बहुत देर तक प्रयास करने के उपरांत कोई मार्ग नहीं निकला तो राजा ने अपने सबसे अनुभवी मंत्री को बुलवाया। मंत्री ने आकर घटनास्थल का निरीक्षण किया और फिर राजा को सुझाव दिया कि सरोवर के चारों और युद्ध के नगाड़े बजाए जाएँ। सुनने वालोँ को विचित्र लगा कि भला नगाड़े बजाने से वह फँसा हुआ हाथी बाहर कैसे निकलेगा, जो अनेक व्यक्तियों के शारीरिक प्रयत्न से बाहर निकल नहीं पाया।

आश्चर्यजनक रूप से जैसे ही युद्ध के नगाड़े बजने प्रारंभ हुए, वैसे ही उस मृतप्राय हाथी के हाव-भाव में परिवर्तन आने लगा। पहले तो वह धीरे-धीरे करके खड़ा हुआ और फिर सबको हतप्रभ करते हुए स्वयं ही कीचड़ से बाहर निकल आया। अब मंत्री ने सबको स्पष्ट किया कि हाथी की शारीरिक क्षमता में कमी नहीं थी, आवश्यकता मात्र उसके अंदर उत्साह के संचार करने की थी। हाथी की इस कहानी से यह स्पष्ट होता है कि यदि हमारे मन में एक बार उत्साह – उमंग जाग जाए तो फिर हमें कार्य करने की ऊर्जा स्वतः ही मिलने लगती है और कार्य के प्रति उत्साह का मनुष्य की उम्र से कोई संबंध नहीं रह जाता।

जीवन में उत्साह बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य सकारात्मक चिंतन बनाए रखे और निराशा को हावी न होने दे। कभी – कभी निरंतर मिलने वाली असफलताओं से व्यक्ति यह मान लेता है कि अब वह पहले की तरह कार्य नहीं कर सकता, लेकिन यह पूर्ण सच नहीं है।

★ हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी आजादी की लड़ाई 48 साल की उम्र में शुरू की थी और हमें आज़ादी दिलाई।

★ जापान के 105 वर्षीय धावक हिडकीची मियाज़ाकि ने 42.22 सेकण्ड्स में 100 मीटर डैश कम्पलीट कर नया विश्व रिकॉर्ड बनाया।

★ मशहूर अभिनेता बोमन ईरानी ने 44 साल की उम्र में एक्टिंग करना शुरू की।

★ ग्रामीण बैंक के फाउंडर और नोबल शांति पुरस्कार विजेता मुहम्मद युनुस ने 43 साल की उम्र में ग्रामीण बैंक की शुरुआत की।

★ अमिताभ बच्चन आज 70 साल से ऊपर होने के बावजूद सबसे सक्रीय बॉलीवुड स्टार्स में से एक हैं।
ऐसे तमाम उदहारण हैं जहाँ लोगों ने साबित किया है कि अगर कुछ कर गुजरने का हौंसला हो तो क्या उम्र और क्या चुनौतियाँ कुछ मायने नहीं रखता ।

→ मित्रों, प्रसिद्ध विचारक जॉन ओ डनह्यू का कहना है

“आप उतने युवा है, जितना आप महसूस करते हैं। अगर आप अंदर के उत्साह को महसूस करना शुरू करेंगे, तो एक ऐसी जवानी महसूस  करेंगे, जिसे कोई भी आपसे छीन नहीं सकता”।

मन में उत्साह हो तो उम्र कभी भी कार्य के मार्ग पर बाधा नहीं बनती। बाधा बनती है तो केवल हमारी नकारात्मक सोच। यदि कार्य करना है तो किसी भी उम्र में कार्य किया जा सकता है, कार्य करने के तरीके बदले जा सकते हैं और पहले की तुलना में अधिक अच्छे ढंग से व कुशलतापूर्वक कार्य किया जा सकता है।

उम्र के असर को बहुत हद्द तक अपने प्रयासों, सकारात्मक सोच और उत्साह से कम किया जा सकता है, अतः ये कहने से पहले कि हमारी उम्र हो गयी है , हम ये नहीं कर सकते , वो नहीं कर सकते उन तमाम लगों के बारे में सोचिये जिनके लिए age एक number से अधिक कुछ नहीं है। अगर वो कर सकते हैं तो कोई भी कर सकता है, तो चलिए फिर से सपने देखना शुरू करिए, फिर से उनका पीछा कीजिये और एक बार फिर अपने सपनो को साकार कर दीजिये।

धन्यवाद!

♠ નાની ઉંમરે વિલક્ષણ પ્રતિભા ♠

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આજના ઇલેક્ટ્રોનિક યુગમાં આજની પેઢી વિવિધ ક્ષેત્રે ખૂબ આગળ જઇ નાની ઉંમરે સિદ્ધિ મેળવે છે.મોટી ઉંમરનાને આ જોઇ એમ થાય કે, અમારા જમાનામાં આવી સવલતો હોત તો અમે પણ.....

હવે ઇતિહાસ જોઇએ...

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👉🏼 શિવાજી ૧૩ વર્ષે રણનો કિલ્લો જીત્યા હતાં.

👉🏼 સિકંદર ૧૭ વર્ષે એક યુદ્ધ જીત્યો હતો.

👉🏼 અકબરે ૧૬ વર્ષે ગાદી સંભાળી.

👉🏼 અહલ્યાબાઇએ ૧૮ વર્ષની ઉંમરે શાસન સંભાળેલું.

👉🏼 સંત જ્ઞાનેશ્વરે ૧૨ વર્ષની ઉંમરે ગીતા પર 'જ્ઞાનેશ્વરી' ભાષ્ય લખ્યું હતું.

👉🏼 શંકરાચાર્યે ૧૬ વર્ષે શાસ્ત્રાર્થમાં વિજય મેળવ્યો હતો.

👉🏼 રવિન્દ્રનાથ ટાગોરે ૧૪મે વર્ષે 'મેકબેથ'નો અનુવાદ કર્યો હતો.

👉🏼 કવિયિત્રી તારાદત્ત ૧૮ વર્ષે વિખ્યાત બની હતી.

👉🏼 સરોજિની નાયડુએ ૧૩ વર્ષની ઉંમરે તેરસો લિટીની કવિતા રચી સાહિત્યમાં સ્થાન મેળવ્યું હતું.

અને અંતે....

👉🏼 મહાન ક્રિકેટર સચીન તેંડુલકરે ૧૬ વર્ષની ઉંમરે આંતરરાષ્ટ્રીય ક્રિકેટમાં પદાર્પણ કર્યું હતું.

→ વિલક્ષણ પ્રતિભા ધરાવનારને આનુવંશિક સંસ્કારો ઉપરાંત તેમની પુરુષાર્થ પરાયણતા,લગન અને પ્રતિભાને યોગ્ય પોષણ આપનારા ગુણો પણ મળ્યા હતાં.

- પંડિત મિહિર દેવ

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♠ कलयुग का दूष्प्रभाव ♠

  
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एक समय की बात है l श्रीकृष्ण और पाँचो पांडव वन से गुजर रहे थे l थोडी देर के बाद कृष्ण कहते हैं- "तुम पाँचों भाई वन में जाओ और जो कुछ भी दिखे वह आकर मुझे बताओ। मैं तुम्हें उसका प्रभाव बताऊँगा।"

पाँचों भाई वन में गये।

युधिष्ठिर महाराज ने
देखा कि किसी हाथी की दो सूँड है।
यह देखकर आश्चर्य का पार न रहा।

अर्जुन दूसरी दिशा में गये। वहाँ उन्होंने देखा कि कोई पक्षी है, उसके पंखों पर वेद की ऋचाएँ लिखी हुई हैं पर वह पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा है
यह भी आश्चर्य है !

भीम ने तीसरा आश्चर्य देखा कि गाय ने बछड़े को जन्म दिया है और बछड़े को इतना चाट रही है कि बछड़ा लहुलुहान हो जाता है।
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☀सहदेव ने चौथा आश्चर्य देखा कि छः सात कुएँ हैं और आसपास के कुओं में पानी है किन्तु बीच का कुआँ खाली है। बीच का कुआँ गहरा है फिर भी पानी नहीं है।
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☀पाँचवे भाई नकुल ने भी एक अदभुत आश्चर्य देखा कि एक पहाड़ के ऊपर से एक बड़ी शिला लुढ़कती-लुढ़कती आती और कितने ही वृक्षों से टकराई पर उन वृक्षों के तने उसे रोक न सके। कितनी ही अन्य शिलाओं के साथ टकराई पर वह रुक न सकीं। अंत में एक अत्यंत छोटे पौधे का स्पर्श होते ही वह स्थिर हो गई।
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☀पाँचों भाईयों के आश्चर्यों का कोई पार नहीं ! शाम को वे श्रीकृष्ण के पास गये और अपने अलग-अलग दृश्यों का वर्णन किया।

☀युधिष्ठिर कहते हैं- "मैंने
दो सूँडवाला हाथी देखा तो मेरे आश्चर्य का कोई पार न
रहा।"
🌹तब श्री कृष्ण कहते हैं- "कलियुग में ऐसे लोगों का राज्य होगा जो दोनों ओर से शोषण करेंगे। बोलेंगे कुछ और करेंगे कुछ। ऐसे लोगों का राज्य होगा। इससे तुम पहले राज्य कर लो।
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☀अर्जुन ने आश्चर्य देखा कि पक्षी के पंखों पर वेद की ऋचाएँ लिखी हुई हैं और
पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा है।
🌹इसी प्रकार कलियुग में ऐसे लोग रहेंगे जो बड़े-बड़े पंडित और विद्वान कहलायेंगे किन्तु वे यही देखते रहेंगे कि कौन-सा मनुष्य मरे और हमारे नाम से संपत्ति कर जाये।
"संस्था" के व्यक्ति विचारेंगे कि कौन सा मनुष्य मरे और
संस्था हमारे नाम से हो जाये।
हर जाति धर्म के प्रमुख पद पर बैठे विचार करेंगे कि कब किसका श्राद्ध है ?
चाहे कितने भी बड़े लोग होंगे किन्तु उनकी दृष्टि तो धन के ऊपर (मांस के ऊपर) ही रहेगी।
परधन परमन हरन को वैश्या बड़ी चतुर।
ऐसे लोगों की बहुतायत होगी, कोई कोई विरला ही संत पुरूष होगा।

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☀भीम ने तीसरा आश्चर्य देखा कि गाय अपने बछड़े को इतना चाटती है कि बछड़ा लहुलुहान हो जाता है।
🌹कलियुग का आदमी शिशुपाल हो जायेगा।
बालकों के लिए इतनी ममता करेगा कि उन्हें अपने
विकास का अवसर ही नहीं मिलेगा।
""किसी का बेटा घर छोड़कर साधु बनेगा तो हजारों व्यक्ति दर्शन करेंगे....
किन्तु यदि अपना बेटा साधु बनता होगा तो रोयेंगे कि मेरे बेटे का क्या होगा ?""
इतनी सारी ममता होगी कि उसे मोह माया और परिवार में ही बाँधकर रखेंगे और उसका जीवन वहीं खत्म हो जाएगा। अंत में बिचारा अनाथ होकर मरेगा। वास्तव में लड़के तुम्हारे नहीं हैं, वे तो बहुओं की अमानत हैं, लड़कियाँ जमाइयों की अमानत हैं और तुम्हारा यह शरीर मृत्यु की अमानत है।
तुम्हारी आत्मा-परमात्मा की अमानत है ।
तुम अपने शाश्वत संबंध को जान लो बस !
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☀सहदेव ने चौथा आश्चर्य यह देखा कि पाँच सात भरे कुएँ के बीच का कुआँ एक दम खाली !
🌹कलियुग में धनाढय लोग लड़के-लड़की के विवाह में,
मकान के उत्सव में, छोटे-बड़े उत्सवों में तो लाखों रूपये खर्च कर देंगे परन्तु पड़ोस में ही यदि कोई भूखा प्यासा होगा तो यह नहीं देखेंगे कि उसका पेट भरा है या नहीं।
दूसरी और मौज-मौज में, शराब, कबाब, फैशन और
व्यसन में पैसे उड़ा देंगे।
किन्तु किसी के दो आँसूँ पोंछने में उनकी रूचि न होगी और जिनकी रूचि होगी उन पर कलियुग का प्रभाव नहीं होगा, उन पर भगवान का प्रभाव होगा।
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☀पाँचवा आश्चर्य यह था कि एक बड़ी चट्टान पहाड़
पर से लुढ़की, वृक्षों के तने और चट्टाने उसे रोक न पाये किन्तु एक छोटे से पौधे से टकराते ही वह चट्टान रूक गई।
🌹कलियुग में मानव का मन नीचे गिरेगा, उसका जीवन पतित होगा।
यह पतित जीवन धन की शिलाओं से नहीं रूकेगा न ही सत्ता के वृक्षों से रूकेगा।
किन्तु हरिनाम के एक छोटे से पौधे से, हरि कीर्तन के एक छोटे से पौधे मनुष्य जीवन का पतन होना रूक जायेगा ।

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♠ મહાનતા ♠

 

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આજે વિશ્વ પ્રાણી દિવસ નિમિત્તે પ્રાણીઓના આંતર મનમાં માનવ જાત પ્રત્યે સંવેદના રજુ કરતી એક હ્રદયસ્પર્શી વાર્તા રજું કરું છું મિત્રો..અંત સુધી વાંચજો અને હા ફોરવર્ડ કરવાનું ભૂલશો નહિ.

એ લોકો મને માતા કહીને પૂજે છે, તેમાં તું રાક્ષસ કેમ થયો ? અરે, માતા થવું સહેલું નથી. અમારી જાત અમે ખેડૂતના ખીલે નિચોવી દઈએ છીએ

એક ગામડા ગામમાં એક ખેડૂત પાસે એક ગાય હતી. તેણે એક બચ્ચાને જન્મ આપ્યો. તેનું નામ પાડયું મૂંજડો. હવે આ મૂંજડો મોટો થવા લાગ્યો. ધીમે ધીમે બળદ બન્યો. મુખવટો દોરીથી બનાવી બાંધી દીધો. હવે તેને મોંએ લગામ હોવાથી પહેલાની જેમ મુક્ત ફરી પણ ન શકે.

જ્યારે કોઈ ન હતું ત્યારે આ મૂંજડાએ માંને પૂછ્યું, 'હેં મા, મને આ ખેડૂતે શા માટે આ મોઢું દોરીથી બાંધી દીધું ? મને કેમ તારી જેમ છૂટો નથી રહેવા દેતો ?'

મા કહે, 'જો બેટા, આ ખેડૂત છે એ જગતનો તાત છે. તેમની પાસે જે જમીન છે તે તારે ખાંધે ધૂંસરી નાંખી ખેડવાની છે. ત્યારે તારું મોઢું પહોળુ ન પડે તે માટે તારા મોંએ નાથ નાખવામાં આવી છે.' કહી માએ મૂંજડાને સમજાવ્યો.

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ખેડૂત હવે મૂંજડાને ખેતરે લઈ જવા લાગ્યો. ખેતરમાં હળ ચલાવવા લાગ્યો, પણ મૂંજડો બિનઅનુભવી નવોસવો હોવાથી બરાબર ચાલતો નહોતો. તેથી ખેડૂતે ક્રોધાવેશમાં આવી જઈ એક ચાબૂક ફટકારી તે મૂંજડો એટલો ગભરાઈ ગયો કે ન પૂછો વાત. હવે તો ખેડૂત સહેજ પણ ઈશારો કરે ત્યાં મૂંજડો દોટ દે. દરમિયાન ઘેર આવતા મૂંજડો દોટ દઈ મા પાસે પહોંચી ગયો અને ચોધાર આંસુએ રડતા કહેવા લાગ્યો, 'જો મા મને આજ તો ખેડૂતે દોરડાની ચાબૂક મારી. જો મારા શરીર પર ઊપસી આવી.'

વળી મા કહે, 'હશે બેટા, તે આપણો અને આ જગતનો તાત ગણાય. આપણો માલિક કહેવાય. ક્યારેક ક્રોધમાં આવીને મારે પણ તેથી શું થયું ? વળી તું બરાબર નહીં ચાલતો હો.' આમ વળી શિખામણ આપી શાંત પાડયો.

પરંતુ એક દિવસની ઘટનાથી તો મૂંજડો એટલો ક્રોધાયમાન થયો કે ન પૂછો વાત. જો માએ તેને ન સમજાવ્યો હોત અથવા જો તેની મા ત્યાં ન હોત તો મૂંજડો આ ખેડૂતને મારી પણ નાખત, એમાંય બે મત નહોતો. બન્યું એવું મૂંજડાનાં મોંએ અચાનક માંખ બેઠી. મૂંજડાએ મોં હલાવ્યું. જેથી શિંગડું સહેજ ખેડૂતને અથડાયું. ખેડૂત સમજ્યો કે મને માર્યું. આથી વાંસનો સારો એવો પરોણો (લાકડી) શોધી બળદને ઝૂડવા જ લાગ્યો. ઝૂડવા જ લાગ્યો. વળી મૂંજડાનો ગુસ્સો આસમાને પહોંચ્યો. આથી તેણે પણ સામી દોટ દીધી. ખેડૂતને સામે કાળ દેખાયો હોય તેમ લાકડી મૂકી સીધો ઘરમાં જ ઘૂસી ગયો. તેવામાં ગાય ભાંભરી, તેમની ભાષામાં મૂંજડાને બોલાવી લીધો અને મંડી ઠપકો આપવા, અરે તારી જાતના મૂંજડા, મારું સંતાન થઈ તેં આવું કૃત્ય કર્યું ? એ લોકો મને માતા કહીને પૂજે છે, તેમાં તું રાક્ષસ કેમ થયો ? અરે, માતા થવું સહેલું નથી. અમારી જાત અમે ખેડૂતના ખીલે નિચોવી દઈએ છીએ.

ઘડપણમાં ઘરછોડી ગામો ગામની શેરીઓમાં ભાટકીએ છીએ. તેમને ખાતરરૃપે મળ-મૂત્ર આપીએ છીએ અને છતાંય ક્યારેક ક્રોધાવેશમાં હોય અથવા અણસમજમાં અમને તો એવી ક્રૂરતા આચરે કે બિલકુલ કાપી પણ નાખે છે, ત્યારે મહાનતા મળી છે. જેને માથે તું પાણી ફેરવે છે ? ત્યારે બળદે આટલું જ કહ્યું, 'મા, આવી મોટાઈ ને શું કરવી ?'

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મિત્રો, મુંજડાનો આ પ્રશ્ન ખરેખર આપણે વિચારવો જોઈએ..!! આપણે ઘણા બધા પ્રાણીઓ પાળીએ..!! એમાં પણ ગાય અને બળદ તો અપણા માટે ભગવાનના આર્શિવાદ સમાન છે..!! આપણે એના પર કેટલો ત્રાસ ગુજારીએ!! છતાં તેઓ ક્યારેય પોતાની વ્યથા કહી શકતા નથી..બળદ જ્યાં સુધી કામ આપે ત્યાં સુધી સાચવીએ, પછી તેને રઝળતો છોડી મૂકીએ..અંતે તે કતલખાને જાય છે..!!

ગાયને આપણે માતા કહીને પૂજીએ, પણ ઘણા લોકો ગાય દૂધ આપવાનું બંધ કરે એટલે એને રઝળતી છોડી મૂકે, પછી ભલે તે ભૂખે મરે કે મરી જાય..!! માતાની મહાનતાનું આટલું જ મૂલ્ય..!! આજે તો ગાયોને કતલખાનામાં કાપીને એનું ગૌમાસ વેંચવામા આવે છે..ખરેખર આજે માનવતા મરી પરવારી છે..!!

 

♠ મારા નામને વળગી ના રહો હું મરું ત્યાં જ બાળી મૂકજો ♠

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આજે ગાંધીજીનો જન્મદિવસ.
સંવત ૧૯૨૫ના ભાદરવા વદ ૧૨ના દિવસે અર્થાત્ ઈ.સ. ૧૮૬૯ની બીજી ઓક્ટોબરે પોરબંદરમાં જન્મેલો એક સામાન્ય બુદ્ધિવાળો, ગરબડિયા અક્ષરોવાળો, ડરપોક અને જુઠ્ઠુ બોલતો, ચોરી કરીને બીડી પીતો કિશોર એક દિવસ આ યુગનો 'મહાપુરુષ' બની જશે એવું કોઈ પણ જ્યોતિષીએ ભાખ્યું નહોતું. પોતાના બચપણથી માંડીને અંત સુધી જીવનને જેવું છે તેવું આરપાર લોકો સમક્ષ મૂકી શકે તેવી આજે કોઈની હિંમત નથી.

ગાંધીજીની આત્મકથા વાંચ્યા પછી લાગે છે કે  બીજા કોઈને પણ આત્મકથા લખવાનોે અધિકાર નથી.

'સત્યના પ્રયોગો'માં ગાંધીજી લખે છેઃ ''બચપણમાં કોઈ મને નિશાળમાં મૂકવા આવેલું તેવું યાદ છે. મુશ્કેલીથી થોડુંક શીખેલો. તે કાળે છોકરાઓની સાથે હું મહેતાને ગાળ દેતાં શીખેલો. હું અનુમાન કરું છું કે મારી બુદ્ધિ મંદ હશે, અને યાદશક્તિ કાચી હશે. હું અતિશય શરમાળ છોકરો હતો. નિશાળમાં મારા કામ સાથે જ કામ હતું. ઘંટ વાગવાના સમયે પહોંચવું અને નિશાળ બંધ થયે ભાગવું. મને કોઈનીયે સાથે વાતો કરવાનું ગમતું નહીં. કોઈ મારી મશ્કરી કરશે તો? એવી બીક રહેતી.''

તેઓ લખે છે : ''દક્ષિણ આફ્રિકામાં વકીલાત કરતાં મેં એક ટેવ પાડી હતી. મારું અજ્ઞાાન હું અસીલો પાસે છુપાવતો નહોતો, બીજા વકીલ સમક્ષ પણ નહીં. જ્યાં જ્યાં મને ખબર ના પડે ત્યાં હું મારા અસીલને બીજા વકીલ પાસે જવાનું કહેતો અથવા બીજા વધુ અનુભવી વકીલની સલાહ લેવાનું કહેતો.''

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બાપુ આઝાદી માટે સત્યાગ્રહ કરતાં અને ત્યારે જેલમાં ગયા હતા. આ સંદર્ભમાં તેઓ હળવાશથી લખે છે : 'વાંચનાર જાણે છે કે હું રીઢો થયેલો ગુનેગાર છું.

૧૯૨૨ના માર્ચ મહિનામાં હું કેદમાં પુરાયો હતો તે મારી જિંદગીની પહેલી કેદ નહોતી. દક્ષિણ આફ્રિકામાં ત્રણ વાર હું ગુનેગાર ઠરી ચૂક્યો હતો. દક્ષિણ આફ્રિકાની સરકાર મને તે વખતે એક જોખમકારક કેદી ગણતી હતી. તેથી એક જેલમાંથી બીજી જેલમાં ફેરવવામાં આવતો. હિંદુસ્તાનમાં આવ્યા પછી જેલમાં જતાં પહેલાં હું છ જેલોનો અનુભવ લઈ ચૂક્યો હતો, એટલા જ જેલ સુપરિન્ટેન્ડન્ટ અને એટલા જ જેલરો સંપર્કમાં આવી ચૂક્યો હતો. મને અમદાવાદની સાબરમતી જેલમાં લઈ જવાયો ત્યારે બીજાઓની જેમ મને કઠતું નહોતું. પ્રેમથી વધુ વિજય મેળવવા માટે એક ઘર બદલીને બીજા ઘેર જતો હોઉં તેમ મને લાગતું.''

બાપુએ જીવનના મોજશોખ અને જરૂરિયાતો ક્રમશઃ કેવી રીતે ઓછી કરી તેનું વર્ણન તેમના જ શબ્દોમાં: ''જેમ ધોબીની ગુલામીમાંથી હું છૂટયો તેમ નાઈની ગુલામીમાંથી પણ છૂટવાનો પ્રસંગ આવ્યો. પ્રિટોરીયામાં હું એક અંગ્રેજ વાળ કપાવવાની દુકાને પહોંચ્યા. તેણે મારી વાળ કાપવાની ઘસીને ના પાડી. તેણે ના પાડતી વખતે અત્યંત તિરસ્કાર બતાવ્યો તે વધારામાં. મને દુઃખ થયું. હું પહોંચ્યો બજારમાં. વાળ કાપવાનો સંચો ખરીધ્યો. અને અરીસા સામે ઊભા રહી મેં જાતે જ મારા વાળ કાપ્યા. વાળ જેમ તેમ કપાયા તો ખરા, પણ પાછળના વાળ કાપતા મુશ્કેલી પડી. હું એવા વાળ સાથે કોર્ટમાં ગયો. બધા મને જોઈને હસવા લાગ્યા.

કોઈએ કહ્યું: 'તારા માથે ઉંદર ફરી ગયા છે?'

મેં કહ્યું: 'ના, મારા કાળા માથાનો સ્પર્શ કોઈ ગોરા નાઈ શા માટે કરે ? એટલે જેવા તેવા પણ હાથે કાપેલા વાળ મને વધુ પ્રિય છે.'

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જીવનના કોઈ પણ ક્ષેત્રમાં બાપુએ ખેડાણ ના કર્યું હોય એવું બન્યું નથી. 'સત્ય અને અહિંસા' નામના અમોઘ શસ્ત્રની અને સત્યાગ્રહની શોધ કરનાર બાપુએ દક્ષિણ આફ્રિકામાં એેક છાપું પણ કાઢયું હતું. '' Young India'' અને ''નવજીવન''ના તેઓ તંત્રી પણ હતા. બાપુ અખબારો માટે લખે છે : ''વર્તમાન પત્રો સેવાભાવથી ચાલવા જોઈએ એ હું ''ઈન્ડિયન ઓપિનિયન''ના પહેલા માસની કારકિર્દીમાં જ જોઈ ગયો. વર્તમાનપત્ર એ ભારે શક્તિ છે, પણ નિરંકુશ પાણીનો ધોધ ગામનાં ગામ ડુબાડે અને પાકનો નાશ કરે છે તેમ નિરંકુશ કલમનો ધોધ પણ વિનાશ વેરી શકે છે. એ અંકુશ બહારથી આવે તો તે નિરંકુશતા વધારે ઝેરી નીવડે છે. ''

બાપુને એક વાર દિલ્હીની પ્રાર્થના બાદ પ્રશ્નોત્તરી વખતે પૂછવામાં આવ્યું: ''જો એક દિવસ માટે આપને હિંદુસ્તાનના સરમુખત્યાર બનાવવામાં આવે તો આપ શું કરો?''

બાપુઃ ''પ્રથમ તો હું સરમુખત્યાર બનું જ નહીં છતાં માની લઈએ કે મને એક દિવસ માટે સરમુખત્યાર બનાવવામાં આવે તો હું વાઈસરોય ભવન (હાલનું રાષ્ટ્રપતિભવન)ને હોસ્પિટલમાં ફેરવી નાખું. વાઈસરોયને આવડા મોટા ઘરનું શું કામ?''

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ટૂંકમાં બડા બડા રાજભવનો અને રાષ્ટ્રપતિભવન વિશે બાપુએ વર્ષો પહેલાં પોતાનો અભિપ્રાય આપી દીધો હતો જેનો અમલ દેશના નેતાઓએ આજ સુધી કર્યો નથી.
તેમને ગોળીથી ઠાર કરવામાં આવ્યા તે પૂર્વે એટલે કે તા. ૨૯મી જાન્યુઆરી ૧૯૪૮ના દિવસે મૃત્યુના ૨૦ કલાક જ અગાઉ જ આ શબ્દો ઉચ્ચાર્યા હતા : ''હું જીર્ણ માંદગીના કારણે મરણ પામું, તો લોકો તમારા પર ક્રોધે ભરાય એ જોખમ વહોરીને પણ દુનિયા આગળ જાહેર કરવાની તમારી ફરજ છે કે, ગાંધી જેનો દાવો કરતો હતો એવો ખુંદાનો બંદો નહોતો. તમે એમ કરશો તો એથી મારા આત્માને શાંતિ મળશે. હમણાં કોઈએ એક દિવસ બોમ્બ વતી કરવા ધાર્યું હતું તેમ કોઈ મને ગોળીથી ઠાર મારીને મારા જીવનનો અંત લાવવાનો પ્રયત્ન કરે અને એ ગોળી દુઃખના એક પોકાર વિના હું ઝીલી લઉં અને રામનું નામ રટતો રટતો પ્રમાણ ત્યાગ કરું તો જ મારો એ દાવો સાચો ઠરશે... ભૂતકાળમાં મારા જાન લેવા મારા પર હુમલા કરવામાં આવ્યા છે, પણ ભગવાને મને આજ સુધી બચાવી લીધો છે પરંતુ મને ગોળી મારનારને એમ લાગે કે હું એક બદમાશને પૂરો કરી રહ્યો છું અને તેવી માન્યતાથી જ પ્રેરાઈને મને ગોળીથી ઠાર કરે તો ખરા ગાંધીને નહીં પરંતુ તેને જે બદમાશ લાગ્યો હતો તેને તેણે મારી નાંખ્યો હશે.''

બાપુનું છેલ્લું વિધાન તેમની નિખાલસતાની પરાકાષ્ટા છે. આવું કોણ કહી શકે કે કોઈ મને મારી નાંખે તો મારામાં રહેલી કોઈ બદમાશીને મારી નાંખી છે.

તેમણે મૃત્યુ પહેલાં કહ્યું હતું કે ''મારા મૃત્યુ બાદ મારા દેહને કોઈ સરઘસ આકારે લઈ જવાનો પ્રયત્ન કરે તો હું તેમને કહું છું કે, ''મારું મડદું બોલી શકે તો- ભલા, મને એમાંથી છોડો અને હું મર્યો હતો ત્યાં જ મને બાળી મૂકો.''
છેલ્લે તેમણે કહ્યું હતું, ''મને વીસરી જાવ. મારા નામને ના વળગો. તત્ત્વને વળગો. તમારી પ્રત્યેક હાલચાલ તે ગજથી માપો, અને આગળ ઉપર આવનારા દરેક પ્રશ્નનો નિર્ભયતાથી જવાબ આપો, હું તો ગરીબ સાધુ છું. છ રેંટિયા, જેલની થાળીઓ, બકરીના દૂધનું એક વાસણ, ખાદીના છ લંગોટ અને એક ટુવાલ- આટલી મારી ઐહિક પૂંજી છે, અને મારા કીર્તિની ઝાઝી કિંમત ન હોઈ શકે. મારા મરણ પછી કોઈ એક જ વ્યક્તિ સંપૂર્ણપણે મારો પ્રતિનિધિ નહીં બની શકે. પરંતુ મારો સ્વલ્પ અંશ તમારા પૈકી ઘણાના જીવનમાં જીવતો રહેશે. દરેક જણ ધ્યેયને પ્રથમ સ્થાન આપે અને પોતાની જાતને છેલ્લી મૂકશે તો ખાલીપો ઘણે અંશે ભરાઈ જશે.

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