♠ ध्यान और मौन ♠

एक व्‍यक्‍ति जिज्ञासाएं लेकर  एक दिन भगवान बुद्ध के पास आया। उसका नाम था मौलुंकपुत्र, एक बड़ा ब्राह्मण विद्वान, अपने पाँच सौ शिष्‍यों के साथ आया था। निश्‍चित ही उसके पास बहुत सारे प्रश्‍न थे। एक बड़े विद्वान के पास होते ही हैं ढेर सारे प्रश्‍न, समस्‍याएं ही समस्‍याएं।

बुद्ध ने उसके चेहरे की तरफ देखा और कहा, मौलुंकपुत्र, एक शर्त है। यदि तुम शर्त पूरी करो,केवल तभी मैं उत्तर दे सकता हूं। मैं देख सकता हूं तुम्‍हारे सिर में भनभनाते प्रश्‍नों को। एक वर्ष तक प्रतीक्षा करो। ध्‍यान करो,मौन रहो। तब तुम्‍हारे भीतर का शोरगुल समाप्‍त हो जाए, जब तुम्‍हारी भीतर की बातचीत रूक जाए,तब तुम कुछ भी पूछना और मैं उत्तर दूँगा। यह मैं वचन देता हूं।

मौलुंकपुत्र कुछ चिंतित हुआ—एक वर्ष, केवल मौन रहना, और तब यह व्‍यक्‍ति उत्तर देगा। और कौन जाने कि वे उत्तर सही भी हो या नहीं? तो हो सकता है एक वर्ष बिलकुल ही बेकार जाए। इसके उत्तर बिलकुल व्‍यर्थ भी हो सकते है। क्‍या करना चाहिए? वह दुविधा में पड़ गया। वह थोड़ा झिझक भी रहा था। ऐसी शर्त मानने मे; इसमें खतरा था।

तभी बुद्ध का एक दूसरा शिष्‍य, सारिपुत्र, जोर जोर से हंसने लगा। वह वहीं पास में ही बैठा था—एकदम खिलखिला कर हंसने लगा। मौलुंकपुत्र और भी परेशान हो गया; उसने कहा,बात क्‍या है? क्‍यों हंस रहे हो तुम?

सारिपुत्र ने कहा, इनकी मत सुनना। ये बहुत धोखेबाज है। इन्‍होंने मुझे भी धोखा दिया। जब मैं आया था। तुम्‍हारे तो केवल पांच सौ शिष्‍य है। मेरे पाँच हजार शिष्य थे । मैं बड़ा ब्राह्मण था, देश में भी मेरी ख्‍याति थी। इन्‍होंने फुसला लिया मुझे; इन्‍होंने कहा, साल भर प्रतीक्षा करो। मौन रहो। ध्‍यान करो। और फिर पूछना और मैं उत्तर दूँगा। और साल भर बाद कोई प्रश्‍न ही नहीं बचा। तो मैंने कभी कुछ पूछा ही नहीं और इन्‍होंने कोई उत्तर दिया ही नहीं।

यदि तुम पूछना चाहते हो तो अभी पूछ लो, मैं इसी चक्‍कर में पड़ गया। मुझे इसी तरह इन्‍होंने धोखा दिया।

बुद्ध ने कहा, मैं पक्‍का रहूंगा अपने वचन पर। यदि तुम पूछते हो, तो मैं उत्तर दूँगा। यदि तुम पूछो ही नहीं,तो मैं क्‍या कर सकता हूं?

एक वर्ष बीता, मौलुंकपुत्र ध्‍यान में उतर गया। और-और मौन होता गया—भीतर की बातचीत समाप्‍त हो गई। भीतर का कोलाहल रूक गया। वह बिलकुल भूल गया कि कब एक वर्ष बीत गया। कौन फिक्र करता है? जब प्रश्‍न ही न रहें, तो कौन फिक्र करता है उत्तरों की? एक दिन अचानक बुद्ध ने पूछा, ‘’यह अंतिम दिन है वर्ष का। इसी दिन तुम यहां आए थे एक वर्ष पहले। और मैंने वचन दिया था तुम्‍हें कि एक वर्ष बाद तुम जो पूछोगे, मैं उत्तर दूँगा, मैं उत्तर देने को तैयार हूं। अब तुम प्रश्न पूछो।

मौलुंकपुत्र हंसने लगा,और उसने कहा,आपने मुझे भी धोखा दिया। वह सारिपुत्र ठीक कहता था। अब कोई प्रश्‍न ही नहीं रहा पूछने के लिए। तो मैं क्‍या पुछूं? मेरे पास पूछने के लिए कुछ भी नहीं है।

असल में यदि तुम सत्‍य नहीं हो तो समस्‍याएं होती है। और प्रश्‍न होते है। वे तुम्‍हारे झूठ से पैदा होते है—तुम्‍हारे स्‍वप्‍न, तुम्‍हारी नींद से वे पैदा होते है। जब तुम सत्‍य, प्रामाणिक मौन समग्र होत हो—वे तिरोहित हो जाते है।

मेरी समझ ऐसी है कि मन की एक अवस्‍था है, जहां केवल प्रश्न होते है; और मन की एक अवस्‍था है, जहां केवल उत्तर होते है। और वे कभी साथ-साथ नहीं होती। यदि तुम अभी भी पूछ रहे हो, तो तुम उत्तर नहीं ग्रहण कर सकते। में उत्तर दे सकता हूं लेकिन तुम उसे ले नहीं सकते। यदि तुम्‍हारे भीतर प्रश्‍न उठने बंद हो गये है, तो कोई जरूरत नहीं है मुझे उत्तर देने की: तुम्‍हें उत्तर मिल जाता है। किसी प्रश्‍न का उत्तर नहीं दिया जा सकता है। मन की एक ऐसी अवस्‍था उपलब्‍ध करनी होती है जहां कोई प्रश्‍न नहीं उठते। मन की प्रश्न रहित अवस्‍था ही एक मात्र उत्तर है।

यही तो ध्‍यान की पूरी प्रक्रिया है: प्रश्‍नों को गिरा देना, भीतर चलती बातचीत को गिरा देना। जब भीतर की बातचीत रूक जाती है। तो एक असीम मौन छा जाता है। उस मौन में हर चीज का उत्तर मिल जाता है। हर चीज सुलझ जाती है—शब्‍दिक रूप से नहीं, आस्तित्वगत रूप में सुलझ जाती है। कहीं कोई समस्‍या नहीं रह जाती है।

♠ ईश्वर का खेल ♠

।।।। सत्य कथा ।।।।

एक बार की बात है एक नगर के राजा ने यह घोषणा करवा दी कि कल जब मेरे महल का मुख्य दरवाज़ा खोला जायेगा तब जिस व्यक्ति ने जिस वस्तु को हाथ ल गा दिया वह वस्तु उसकी हो जाएगी ! इस घोषणा को सुनकर सभी नगरवासी रात को ही नगर के दरवाज़े पर बैठ गए और सुबह होने का इंतजार करने लगे ! सब लोग आपस में बातचीत करने लगे कि मैं अमुक वस्तु को हाथ लगाऊंगा !

कुछ लोग कहने लगे मैं तो स्वर्ण को हाथ लगाऊंगा , कुछ लोग कहने लगे कि मैं कीमती जेवरात को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग घोड़ों के शौक़ीन थे और कहने लगे कि मैं तो घोड़ों को हाथ लगाऊंगा , कुछ लोग हाथीयों को हाथ लगाने की बात कर रहे थे , कुछ लोग कह रहे थे कि मैं दुधारू गौओं को हाथ लगाऊंगा , कुछ लोग कह रहे थे कि राजा की रानियाँ बहुत सुन्दर है मैं राजा की रानीयों को हाथ लगाऊंगा , कुछ लोग राजकुमारी को हाथ लगाने की बात कर रहे थे ! कल्पना कीजिये कैसा अद्भुत दृश्य होगा वह !!

उसी वक्त महल का मुख्य दरवाजा खुला और सब लोग अपनी अपनी मनपसंद वस्तु को हाथ लगाने दौड़े ! सबको इस बात की जल्दी थी कि पहले मैं अपनी मनपसंद वस्तु को हाथ लगा दूँ ताकि वह वस्तु हमेशा के लिए मेरी हो जाएँ और सबके मन में यह डर भी था कि कहीं मुझ से पहले कोई दूसरा मेरी मनपसंद वस्तु को हाथ ना लगा दे !

राजा अपने सिंघासन पर बैठा सबको देख रहा था और अपने आस-पास हो रही भाग दौड़ को देखकर मुस्कुरा रहा था ! कोई किसी वस्तु को हाथ लगा रहा था और कोई किसी वस्तु को हाथ लगा रहा था ! उसी समय उस भीड़ में से एक छोटी सी लड़की आई और राजा की तरफ बढ़ने लगी ! राजा उस लड़की को देखकर सोच में पढ़ गया और फिर विचार करने लगा कि यह लड़की बहुत छोटी है शायद यह मुझसे कुछ पूछने आ रही है ! वह लड़की धीरे धीरे चलती हुई राजा के पास पहुंची और उसने अपने नन्हे हाथों से राजा को हाथ लगा दिया ! राजा को हाथ लगाते ही राजा उस लड़की का हो गया और राजा की प्रत्येक वस्तु भी उस लड़की की हो गयी !

→ जिस प्रकार उन लोगों को राजा ने मौका दिया था और उन लोगों ने गलती की ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी हमे हररोज मौका देता है और हम हररोज गलती करते है ! हम ईश्वर को हाथ लगाने अथवा पाने की बजाएँ ईश्वर की बनाई हुई संसारी वस्तुओं की कामना करते है और उन्हें प्राप्त करने के लिए यत्न करते है पर हम कभी इस बात पर विचार नहीं करते कि यदि ईश्वर हमारे हो गए तो उनकी बनाई हुई प्रत्येक वस्तु भी हमारी हो जाएगी !

→ ईश्वर बिलकुल माँ की तरह ही है , जिस प्रकार माँ अपने बच्चे को गोदी में उठाकर रखती है कभी अपने से अलग नहीं होने देती ईश्वर भी हमारे साथ कुछ ऐसा ही खेल खेलते है ! जब कोई बच्चा अपनी माँ को छोड़कर अन्य खिलौनों के साथ खेलना शुरू कर देता है तो माँ उसे उन खिलौनों के खेल में लगाकर अन्य कामों में लग जाती है ठीक इसी प्रकार जब हम ईश्वर को भूलकर ईश्वर की बनाई हुई वस्तुओं के साथ खेलना शुरू कर देते है तो ईश्वर भी हमे उस माया में उलझाकर हमसे दूर चले जाते है पर कुछ बुद्धिमान मनुष्य ईश्वर की माया में ना उलझकर ईश्वर में ही रमण करते है और उस परम तत्व में मिल जाते है फिर उनमें और ईश्वर में कोई भेद नहीं रहता ! इसी बात को गुरु ग्रन्थ साहिब में इन शब्दों में कहा गया है –
” जाके वश खान सुलतान , ताके वश में सगल जहान “
अर्थ – जिसके वश में ईश्वर होते है उसके वश में सारी दुनियाँ होती है !

♠ ईश्वर के दर्शन ♠

एक नदी के किनारे एक महात्मा रहते थे। उनके पास दूर-दूर से लोग अपनी समस्याओं का समाधान पाने आते थे।

एक बार एक व्यक्ति उनके पास आया और बोला- “महाराज! मैं लंबे समय से ईश्वर की भक्ति कर रहा हूं, फिर भी मुझे ईश्वर के दर्शन नहीं होते। कृपया मुझे उनके दर्शन कराइए।“

महात्मा बोले- “तुम्हें इस संसार में कौन सी चीजें सबसे अधिक प्रिय हैं?”

व्यक्ति बोला- “महाराज! मुझे इस संसार में सबसे अधिक प्रिय अपना परिवार है और उसके बाद धन-दौलत।“

महात्मा ने पूछा- “क्या इस समय भी तुम्हारे पास कोई प्रिय वस्तु है?”

व्यक्ति बोला- “मेरे पास एक सोने का सिक्का ही प्रिय वस्तु है।“

महात्मा ने एक कागज पर कुछ लिखकर दिया और उससे पढ़ने को कहा। कागज देखकर व्यक्ति बोला- “महाराज! इस पर तो ईश्वर लिखा है।“

महात्मा ने कहा- “अब अपना सोने का सिक्का इस कागज के ऊपर लिखे‘ईश्वर’शब्द पर रख दो।“

व्यक्ति ने ऐसा ही किया। फिर महात्मा बोले- “अब तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?”

वह बोला- “इस समय तो मुझे इस कागज पर केवल सोने का सिक्का रखा दिखाई दे रहा है।“

महात्मा ने कहा- “ईश्वर का भी यही हाल है। वह हमारे अंदर ही है, लेकिन मोह-माया के कारण हम उसके दर्शन नहीं कर पाते। जब हम उसे देखने की कोशिश करते हैं तो मोह-माया आगे आ जाती है। धन-संपत्ति, घर-परिवार के सामने ईश्वर को देखने का समय ही नहीं होता। यदि समय होता भी है तो उस समय जब विपदा होती है। ऐसे में ईश्वर के दर्शन कैसे होंगे?”

महात्मा की बातें सुनकर व्यक्ति समझ गया कि उसे मोह-माया से निकलना है।

♠ સાચો મનુષ્ય ♠

દક્ષિણ ભારતના એક પ્રાંતમાં  વિશાળ મંદિર હતું.તે મંદિરના મુખ્ય પૂજારીનું અવસાન થતાં મંદિરના અન્ય મહંતે બીજા પૂજારીની નિમણૂંક કરવાની ઘોષણા કરાવી.તેણે જણાવ્યું કે કાલે સવારે જે પ્રથમ પહોરમાં આવીને પૂજા વિશેના જ્ઞાનમાં સિદ્ધ સાબિત થશે તેને પૂજારી જાહેર કરાશે.

આ ઘોષણા સાંભળીને અનેક બ્રાહ્મણો સવારે મંદિરમાં આવી ગયાં.મંદિર પહાડ પર હતું અને ત્યાં પહોંચવાનો માર્ગ કાંટા અને પથ્થરોથી ભરેલો હતો.માર્ગની આ જટિલતાનું કોઇપણ રીતે નિવારણ લાવીને બ્રાહ્મણો મંદિરમાં પહોંચ્યાં.

મહંતે બધાને કેટલાંક પ્રશ્નો અને મંત્ર પૂછયાં.જ્યારે પરીક્ષા પૂરી થઇ ત્યારે એક યુવાન બ્રાહ્મણ ત્યાં આવ્યો.તે પરસેવાથી લથબથ હતો અને તેના કપડા પણ ફાટી ગયાં હતાં.મહંતે તેને કારણ પૂછ્યું તો તે બોલ્યો, '' ઘરેથી તો વહેલો જ નિકળ્યો હતો પણ રસ્તામાં કાંટા અને પથ્થરો જોયાં તો તેને કાઢવા લાગ્યો જેથી ભક્તોને તકલીફ ન પડે.તેના કારણે મોડું થઇ  ગયું.''

મહંતે તેને પૂજાવિધિ પૂછી જે તેણે જણાવી.મહંતે પછી તેને મંત્ર વિશે પૂછયું તો તેણે જણાવ્યું કે ભગવાનને નવડાવા અને ખવડાવવા માટેના મંત્રો હોય છે તેની મને જાણ નથી.મહંત બોલ્યા,પૂજારી તો તું બની ગયો,મંત્રો હું તને શિખવી દઇશ.

આ સાંભળીને અન્ય બ્રાહ્મણોએ નારાજગી દર્શાવી.ત્યારે મહંત બોલ્યાં,પોતાના સ્વાર્થની વાત તો પશું પણ જાણે છે,પણ સાચો મનુષ્ય એ છે જે બીજાના દુ:ખ માટે પોતાનાં સુખ છોડી દે.

સાર એટલો જ છે કે જ્ઞાન અને અનુભવ વૈયક્તિક છે જ્યારે માનવતા હંમેશા પરગજુ હોય છે, તેથી તે સતત સમાજ કલ્યાણમાં જ વ્યસ્ત હોય છે.

♠ કઠિયારાનું આયોજન ♠

www.sahityasafar.blogspot.com

એકવાર રાજાભોજ નદી કિનારે લટાર મારતા હતા. આજુ-બાજુ લીલુછમ્મ ઘાસ, ખળખળ વહેતી નદી, વૃક્ષો, હવામાં લહેરાતા ફૂલો... રાજા આનંદિત થઈ ગયા. તેવામાં તેમની નજર એક કઠિયારા પર પડી. માથા પર લાકડાનો ભારો મૂકેલો હતો. તડકામાં વજન ઉપાડીને આવતો હતો છતાં તે ખુશ દેખાતો હતો, આનંદમાં હોય તેમ ધીમે-ધીમે કંઈક ગાતો-ગાતો જતો હતો. રાજાએ તેને પૂછયું, 'તું કોણ છે?'

કઠિયારો બોલ્યો, 'હું અહીંનો રાજા છું'

રાજાને નવાઈ લાગી. તેમણે પોતાની ઓળખાણ છૂપાવી અને તેના વિશે વધુ જાણવા વાતો કરવા લાગ્યા. તેણે કઠિયારાને પૂછયું, 'તું કેટલું કમાય છે? તું તારી આવકથી ખુશ છે?'

કઠિયારો બોલ્યો, 'હું રોજના છ પૈસા કમાઉ છું અને હું બહું ખુશ છું'

રાજાએ વિચાર્યું કે મારા ખજાનામાં અઢળક નાણું, સોના મહોર પડેલી છે છતાં મને કેટલા પ્રશ્નો છે અને આ કઠિયારો રોજના છ પૈસામાં ખુશ કેવી રીતે રહેતો હશે?

કઠિયારો તેમના મનમાં ચાલતા વિચાર સમજી ગયો હોય તેમ બોલ્યો, 'જુઓ, તમને વિશ્વાસ નથી આવતો ને? તો હું તમને સમજાવું. છ પૈસામાંથી એક પૈસો હું રોકાણકારને આપું છું. એક મારા મિનિસ્ટરને, એક મારા લેણિયાતોને, એક મારા બેંક ખાતામાં જમા કરું છું, એક મહેમાન માટે રાખું છું અને એક મારા માટે રાખું છું.'

રાજાને કઠિયારીની વાત સમજાય નહીં તેમના ચહેરા પરના ભાવ કઠિયારો સમજી ગયો અને કહ્યું, 'ચલો તમને સમજાવું, મારા માતા-પિતા મારા રોકાણકાર છે. તેમણે મને મોટો કર્યાે, ધંધો કરતા શીખડાવ્યું એટલે એક પૈસો તેમને આપું છું, એક પૈસો મારા મિનિસ્ટર એટલે કે મારી પત્નીને આપું છું, કારણ કે તે ઘર ચલાવે છે અને બધાનું ધ્યાન રાખે છે. મારા બાળકો એ મારા લેણિયાત કહેવાય. તેમના માટે એક પૈસાનો ખર્ચ કરું છું. પછી રોજ એક પૈસો ભવિષ્ય માટે બચાવું છું. કારણ કે જે ભવિષ્યનો વિચાર ન કરે તે દુઃખી થાય. પછી એક પૈસો મારા ઘરમાં આવતા મહેમાન માટે રાખુ છું જેથી કયારેક મહેમાન આવે તો સારી રીતે રાખી શકું અને એક પૈસો મારા મોજ-શોખ માટે જુદો રાખુ છું.'

રાજા તો ગરીબ કઠિયારાની વાતો સાંભળીને છક થઈ ગયા. તેમને સમજાય ગયંુ કે ખરેખરું સુખ માત્ર સંપત્તિથી નથી મળતું, આપણી પાસે જે કંઈ છે તેને સરખી રીતે વાપરવાથી સાચો આનંદ મળે છે.

આવીજ શ્રેષ્ઠ બોધકથાઓ વાંચવા માટે મારા નિચેના બ્લોગની મુલાકાત લો.

www.sahityasafar.blogspot.com

♠ ફરજ અને કર્મ ♠

સમય હોય તો વાંચજો...

એક પિતા એ તેના પુત્ર ને કહ્યું મારી અંતિમ વિધિ મા તને ત્રણ કલાક લાગશે અને મારું શ્રાદ્ધ કરવામાં પાંચ કલાક લાગશે તો હું એમ કહું છુ કે આ બંને વિધિ માંથી તને મુંક્ત કરું છુ મારી બોડી નું દાન દઈ દેજે અને શ્રાધ્ધ ના કરતો પણ આ ૮ કલાક નો તારો સમય બચાવું છું તે તું મને જીવતા આપી દે અને ૮ દિવસ સુધી રોજ ૧ કલાક મારી પાસે બેસ...

કડવું સત્ય છે પ્રમાણિક પણે સ્વીકારવું વરવું છે,

આપ ગમે તેટલા વ્યસ્ત હો ઓફીસ ના સમય માંથી માત્ર એકાદ બે મિનીટ નો સમય કાઢી ને ઘરે ફોન કરો બા /બાપુ જમ્યા .દવા લીધી કામ ઘણું છે છતાં હું જલ્દી આવી જઈશ (માતા પિતા નો જવાબ મળશે નિરાતે આવજે બેટા ) અને ઘરે આવી tv નું બટન અને છાપુ છોડી બા બાપુ પાસે બેસી ખબર પૂછો તો તેજ કહેશે “બેટા થાકી ગયો હોઈશ જા હાથ મો ધોઈ ને જમી લે અને આરામ કર”

માત્ર વડીલો ને ૧/૨ કલાક આપવાથી તેની ૨૩ કલાક સારી જશે અને અડધી બીમારી દવા વગર સારી થઇ જશે...

પછી તસ્વીર લાગણી નહિ સમજી શકે અને “”ફૂલ ગયું ફોરમ રહી ગઈ” તેમ પેપર માં આપવાની જરૂર નથી તેના કરતા તે પૈસા કોઈ એકલા રહેતા વૃદ્ધ ને અને જરૂરિયાત વાળા ને આપો.

પિતા ને રસ્તો ક્રોસ કરવો છે તમે એકદમ ફ્રી છો હવે પિતા ને રસ્તો ક્રોસ કરવાથી જ કામ છે તેમ વિચારી નોકર ને કહો તો તે પણ રસ્તો ક્રોસ કરાવી આપશે પણ પિતા ને નોકર ના સ્પર્શ માં દીકરા ના સ્પર્શ નો આનંદ અને સંતોષ નહિ મળે તમે જો ઉભા થશો તો પિતા જ કહેશે તું બેઠ કામ કર રામુ ક્રોસ કરાવી આપશે ...

અહી તમારી જો પિતા તરફ નિષ્ઠા હશે તો તમારી ઓરા કામ કરશે વડીલો ની જરૂરિયાત સીમિત હોય છે કોઈ વખત માતા પિતા ને તેની જરૂરી ચીજ ચુપ ચાપ લાવી સર પ્રાઈઝ આપી છે ? એક વખત ટ્રાય કરો તેની આંખનો ખૂણો જુઓ સ્વર્ગ દેખાશે ઉમર થતા વડીલો નો સ્વભાવ થોડો બદલે છે ત્યારે વિચારવું હું પણ વૃદ્ધત્વ ની line માં ઉભો છુ.....

Give time to your Parents.

♠ मन का प्रेम ♠

एक मज़ेदार कहानी है दोस्तो...अंत तक जरूर पढना l

www.sahityasafar.blogspot.com

गर्मियों के दिनों में एक शिष्य अपने गुरु से सप्ताह भर की छुट्टी लेकर अपने गांव जा रहा था। तब गांव पैदल ही जाना पड़ता था। जाते समय रास्ते में उसे एक कुआं दिखाई दिया।

शिष्य प्यासा था, इसलिए उसने कुएं से पानी निकाला और अपना गला तर किया। शिष्य को अद्भुत तृप्ति मिली, क्योंकि कुएं का जल बेहद मीठा और ठंडा था।
शिष्य ने सोचा - क्यों ना यहां का जल गुरुजी के लिए भी ले चलूं। उसने अपनी मशक भरी और वापस आश्रम की ओर चल पड़ा। वह आश्रम पहुंचा और गुरुजी को सारी बात बताई।

गुरुजी ने शिष्य से मशक लेकर जल पिया और
संतुष्टि महसूस की। उन्होंने शिष्य से कहा- वाकई जल तो गंगाजल के समान है। शिष्य को खुशी हुई। गुरुजी से इस तरह की प्रशंसा सुनकर शिष्य आज्ञा लेकर अपने गांव चला गया।

कुछ ही देर में आश्रम में रहने वाला एक दूसरा शिष्य गुरुजी के पास पहुंचा और उसने भी वह जल पीने की इच्छा जताई। गुरुजी ने मशक शिष्य को दी। शिष्य ने जैसे ही घूंट भरा, उसने पानी बाहर कुल्ला कर दिया।

शिष्य बोला- गुरुजी इस पानी में तो कड़वापन है और न ही यह जल शीतल है। आपने बेकार ही उस शिष्य की इतनी प्रशंसा की।

गुरुजी बोले- बेटा, मिठास और शीतलता इस जल में नहीं है तो क्या हुआ। इसे लाने वाले के मन में तो है। जब उस शिष्य ने जल पिया होगा तो उसके मन में मेरे लिए प्रेम उमड़ा। यही बात महत्वपूर्ण है। मुझे भी इस मशक का जल तुम्हारी तरह ठीक नहीं लगा। पर मैं यह कहकर उसका मन दुखी करना नहीं चाहता था। हो सकता है जब जल मशक में भरा गया, तब वह शीतल हो और मशक के साफ न होने पर यहां तक आते-आते यह जल वैसा नहीं रहा, पर इससे लाने वाले के मन का प्रेम तो कम नही होता है ना।

♥ कहानी की सीख ♥

→ दूसरों के मन को दुखी करने वाली बातों को टाला जा सकता है और हर बुराई में अच्छाई खोजी जा सकती है।

♥ Source :- ALL WORLD GAYATRI PARIWAAR

ऐसी ही और मजेदार कहानिया पढे मेरे ब्लोग पर.....👇

www.sahityasafar.blogspot.com

♠ વેરથી શમે ના વેર ♠


બે રાજ્યોની સીમા વચ્ચે વહેતી નદીનું પાણી
કેટલીયવાર માનવીના લોહીથી રક્તવર્ણુ બની
ચૂક્યું હતું. આ નદી પર કોનું પ્રભુત્વ, એને માટે બે
રાજ્યો વચ્ચે વર્ષોથી વિગ્રહ ચાલતો હતો. એક
પેઢી બીજી પેઢીને એના વારસામાં આ દુશ્મનાવટ
આપતી હતી. બંને રાજ્યોના રાજાઓ એમ
વિચારતા કે કોઇ પણ રીતે વિરોધીને પરાસ્ત કરીને
આ નદી પર માલિકીહક્ક મેળવવો છે. નદીને માટે બંને રાજ્યો વચ્ચે ઘણા ભીષણ સંગ્રામો થયા.

એવામાં વિહાર કરતા-કરતા ભગવાન બુદ્ધ આ
પ્રદેશમાં આવ્યા. તેઓ વૃક્ષ નીચે બેસીને ઉપદેશ
આપવા જતા હતા, ત્યાં તો એમના દર્શનાર્થે એક
રાજ્યનો સેનાપતિ આવી પહોંચ્યો. સંજોગવશાત્
બીજા રાજ્યનો સેનાપતિ પણ ભગવાન બુદ્ધના
દર્શનાર્થે આવ્યો. બંનેની આંખમાં વેર હતું, પણ હવે અહીથી પાછા ફરવું મુશ્કેલ હતું.

ભગવાન બુદ્ધે કહ્યું, 'સારું થયું તમે બંને એક સાથે
આવ્યા. મારે તમને બંનેને સમાન વાત કરવી હતી. તમારા પૂર્વજો પણ વેરને કારણે અંધ હતા અને તમે પણ એવા જ અંધ છો. તમે એકબીજાનો સંહાર કરતા રહ્યા અને નદીનું પાણી તો વહેતું જ રહ્યું. આ નાનકડી વાત પણ તમને નજરે ચડી નહી !'

'એટલે ?' એક સાથે બંને સેનાપતિ બોલી ઊઠયા.
'એનો અર્થ એટલો કે તમને બંનેને નદીના જળની જરૃર છે અને નદી પાસે પુષ્કળ પાણી છે. પછી એના માલિક થવાનો અભરખો શા માટે ? અને તમે ક્યાંથી નદીના માલિક બની શકવાના છો ?
કારણ કે એનું પાણી તો અંતે સાગરમાં વહી જાય છે. તમારી દુશ્મનાવટમાં તો તમે બંને એના વિપુલ જળનો પૂરો ઉપયોગ પણ કરી શકતા નથી.'

એક સેનાપતિએ કહ્યું, 'પણ આ તો અમારે માટે
રાજની આબરૃનો સવાલ છે. એમ કંઇ પ્રભુત્વ છોડી
દેવાય ?'

ભગવાન બુદ્ધે કહ્યું, 'એક તટ પર એક રાજ્યનું પ્રભુત્વ છે અને બીજા કિનારે બીજાનું. એમાં સમસ્યા શું છે ?

વળી તમે આ વહેતી નદીના વિશાળ પટમાં કઇ રીતે તમારી સીમા નિર્ધારિત કરશો ? માટે વેર-ઝેર
છોડીને અમૃતસમાં જળનો ઉપયોગ કરો અને લડવાનું બંધ કરો. પાણીને માટે લોહી વહેવડાવતા અટકો.

જ્યારે તમે નદીના સઘળા પાણીનો ઉપયોગ કરી
લો, ત્યારબાદ કોઇ ઝઘડો ઊભો થાય તો મારી
પાસે જરૃર આવજો. પણ નદીનું સઘળું પાણી વપરાઇ જાય, તે પહેલા કદી મારી પાસે આવશો નહી.'

♥ કુમારપાળ દેસાઈ ♥

♠ विपत्ति और घबराहट ♠


एक राजा अपने कुछ सेवकों को साथ लेकर कहीं दूर देश को जा रहा था। रास्ते में कुछ यात्रा समुद्र की थी इसलिए जहाज में बैठकर चलने का प्रबन्ध किया। राजा अपने सेवकों समेत जहाज में सवार हुआ। मल्लाहों ने लंगर खोल दिया।

जहाज जब कुछ दूर आगे चला तो लहरों के थपेड़ों के साथ टकरा कर वह हिलने लगा। सब लोग कई बार यात्रा कर चुके थे इसलिए कोई व्यक्ति इस हिलने डुलने से घबराया नहीं किन्तु एक सेवक जो बिल्कुल नया था। चारों ओर पानी ही पानी और बीच में डगमगाता हुआ जहाज देखकर बुरी तरह घबराने लगा। उसकी सारी देह काँप रही थी। मुँह से घिग्घी बंध रही थी नसों का लोहू पानी हुआ जा रहा था।

उसके साथी अन्य सेवकों ने समझाया, राजा ने ढांढस बंधाया। उसे बार-बार समझाया जा रहा था कि ‘यह विपत्ति देखने में ही बड़ी मालूम देती है वास्तव में तो प्रकृति की साधारण सी हलचल है। हम लोगों को इनसे डरना नहीं चाहिये और धैर्यपूर्वक अच्छा अवसर आने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।’ लेकिन इस समझाने बुझाने का उस पर कुछ असर नहीं हुआ। उसका डर और घबराहट बढ़ रहे थे धैर्य छोड़ कर वह घिग्घी बाँधकर रोने लगा।

यात्रा करने वालों में से एक सेवक बहुत बुद्धिमान था। उसने राजा से कहा-महाराज आज्ञा दें तो मैं इनका डर दूर कर सकता हूँ। राजा ने आज्ञा दे दी।

वह उठा और उस बहुत डरने वाले यात्री को उठाकर समुद्र में फेंक दिया। जब तीन चार गोते लग गये तो उसे पानी में से निकाल लिया गया। और जहाज के एक कोने पर बिठा दिया गया। अब न तो वह रो रहा था और न डर रहा था।

राजा ने उस बुद्धिमान सेवक से पूछा इसमें क्या रहस्य है कि तुमने इसे पानी में पटक दिया और अब यह निकला है तो बिलकुल नहीं डर रहा है?

उस सेवक ने हाथ जोड़कर नम्रतापूर्वक कहा- श्रीमान! इससे पहले इसने डूबने का कष्ट नहीं देखा और न यह जहाज का महत्व जानता था। अब इसने वह जानकारी प्राप्त कर ली है तो घबराना छोड़ दिया है।

�� हम साधारण सी विपत्ति को देखकर धैर्य छोड़ देते हैं और किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं। उस समय हमें स्मरण करना चाहिये दूसरे लोग जो इससे भी हजारों गुनी विपत्तियों में पड़े हैं और उन्हें सह रहे हैं। इस विपत्ति के समय में भी जो सुविधाएं हमें प्राप्त हैं उनके लिये ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिये क्योंकि दूसरे असंख्य मनुष्य उनसे भी वंचित हैं।

♥ अखण्ड ज्योति 1940 दिसम्बर  ♥

♠ ગુરુદક્ષિણા ♠

ભારતના ખ્યાતનામ આંતરરાષ્ટ્રીય ભૌતિકવિજ્ઞાની સત્યેન્દ્રનાથ બોઝ અને જર્મનીમાં વસતા વિજ્ઞાાની આલ્બર્ટ આઇન્સ્ટાઇન વચ્ચે ગાઢ સબંધ હતો.

સત્યેન્દ્રનાથ બોઝે પોતાના ગુરુ આઇન્સ્ટાઇનની
અનુમતિ મેળવીને એમના સાપેક્ષવાદ વિશેના
લેખોના અંગ્રેજી અનુવાદનું પુસ્તક પ્રગટ કર્યું હતું.
સત્યેન્દ્રનાથે એક બ્રિટિશ સામયિકે અસ્વીકૃત કરેલો લેખ આઇન્સ્ટાઇનને મોકલી આપ્યો અને આઇન્સ્ટાઇને એ લેખને અમૂલ્ય અને સીમાચિહનરૃપ ગણાવ્યો.

૧૯૨૫-'૨૬માં સત્યેન્દ્રનાથ બોઝે તૈયાર કરેલો એક
લેખ આઇન્સ્ટાઇને સ્વયં જર્મન ભાષામાં અનુવાદિત કર્યો હતો. સત્યેન્દ્રનાથ બોઝ બર્લિન ગયા, ત્યારે આઇન્સ્ટાઇને એમને ઉમળકાભેર આવકાર્યા હતા અને બર્લિનમાં પ્લાંક, શ્રોડિંજર, પાઉલી, હેઝનબર્ગ જેવા ભૌતિકવિજ્ઞાાનીઓ સાથે મુલાકાત કરાવી હતી.

આઇન્સ્ટાઇન પોતાની જિંદગીના પાછલા સમયમાં
'યૂનિફાઈડ ફિલ્ડ થિયરી' પર સંશોધન કરતા હતા.
સત્યેન્દ્રનાથ બોઝે એક સંશોધનલેખ તૈયાર કર્યો,
જેમાં આઇન્સ્ટાઇનના એ સિદ્ધાંતની વિવેચના કરવાની સાથોસાથ એમણે એમની અનેક ધારણાઓનો ખુલાસો કર્યો હતો. સત્યેન્દ્રનાથ આ લેખ આઇન્સ્ટાઇનને બતાવવાના હતા અને એમની સાથે વિચારવિમર્શ કર્યા બાદ વિશ્વસમક્ષ પ્રસ્તુત કરવાના હતા, પરંતુ સત્યેન્દ્રનાથ બોઝ આઇન્સ્ટાઇનને મળે તે પહેલાં એમને જાણ થઈ કે ગુરુતુલ્ય આઇન્સ્ટાઇનનું અવસાન થયું છે.
આ સાંભળી સત્યેન્દ્રનાથ મૂર્છિત થઈ ગયા અને
જ્યારે એ બેહોશીમાંથી બહાર આવ્યા, ત્યારે એ
તમામ શોધપત્રો નષ્ટ કરી દીધા.

આ શોધપત્રો પોતાના ગુરુના આઇન્સ્ટાઇનના
સિદ્ધાંતની વિવેચના પર હતા અને આથી એમની
સહમતિ વિના એને પ્રકાશિત કરવા એ ગુરુનું
અપમાન ગણાય. બૌદ્ધિક દ્રષ્ટિએ કે સંશોધનની દ્રષ્ટિએ સત્યેન્દ્રનાથનું આવું પગલું ઉચિત ન લાગે, પણ એમના મનમાં આઇન્સ્ટાઇન પ્રત્યે અપાર શ્રધ્ધા હતી. જો આ સંશોધનપત્રો આઇન્સ્ટાઇનની અનુમતિ વિના પ્રકાશિત થઈ ગયા તો સત્યેન્દ્રનાથ બોઝની કીર્તિ સવિશેષ ફેલાઈ હોત, પણ એ સંશોધનપત્રો નષ્ટ કરીને સત્યેન્દ્રનાથ બોઝે આઇન્સ્ટાઇનને અનુપમ ગુરુદક્ષિણા આપી.

★ કુમારપાળ દેસાઇ ★

♠ અટલ વિશ્વાસ ♠

છોડ સંવેદનશીલ હોય છે,આ સિદ્ધ કરનાર જગદીશચંદ્ર બોઝ ઇંગ્લેન્ડ ગયાં.વૈજ્ઞાનિકોની સભામાં તેમને પોતાની વાતને સાચી સિદ્ધ કરવાની હતી.બોઝ છોડને ઇંજેક્શન લગાવીને એ સિદ્ધ કરવા માંગતા હતા કે વિષને કારણે છોડ પર પણ પ્રતિક્રિયા થાય છે.તેના પર વિષનો તેવોજ પ્રભાવ હોય છે,જેવો કે અન્ય પ્રાણીઓ પર. ઇંજેક્શન તો લાગ્યું પણ છોડને કંઇ જ ન થયું.તે તેમનો તેમજ રહ્યો.

જગદીશ ચંદ્ર બોઝ ખૂબજ આત્મવિશ્વાસી વ્યક્તિ હતાં.તેમણે તે સભામાં ઘોષણા કરી - '' આ છોડ પર વિષયુક્ત ઇંજેક્શનનો કોઇ પ્રભાવ ન થયો તો એનાથી મને પણ કંઇ નહિ થાય.'' આમ કહીને તેમણે બીજી સોય પોતાના હાથે લગાવી દીધી.બધા આશ્ચર્યચકિત થયાં.બધાં દુષ્પરિણામની આશંકાથી ચિંતિત હતાં.બોઝને કંઇ ન થયું.આના પર ઇંજેક્શનની તપાસ કરી તો એ વાત ધ્યાનમાં આવી કે તે વિષનું ઇંજેક્શન ન હતું.નિર્વિષ થવાના કારણે તેનું અપેક્ષિત પરિણામ ન મળ્યું.ભૂલ સુધારીને ત્યારબાદ સોય લગાડી તો તાત્કાલિક પ્રતિક્રિયા થઇ.

પોતાની શોધના સંબધમાં જગદીશ ચંદ્ર બોઝને અટલ વિશ્વાસ હતો.મૃત્યુ પણ આત્મવિશ્વાસી વ્યક્તિની મુઠ્ઠીમાં રહે છે.